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कभी-कभी अचानक दिखती है वो भी घने पेड़ पौधों में

किसी ने बताया की प्रकृति बदल रही है थोड़ी देर तक सोच में पड़ा कैसे....फिर लगा सही कहा इन्होने देखा जाये सब बदल रहा है...सालों पहले रिश्ते चिट्ठियों पे चलते थे फिर दूरभाष पे चलने लगें....और आज व्हाट्सएप, फेसबुक और सोशल साधन...खेर सब धीरे-धीरे समय बदला...लोग समझने लगे जानने लगे...पर इंसान आगे बढ़ने की जल्द बाजी में सब भूल गया...जितने यंत्र बने सबने कुछ न कुछ तबाही की..आसमान में गिद्ध थे जो अब दीखते नहीं है... आंगन की शोभा बढ़ाने वाली गौरैया थी जो गायब हो गयी कभी-कभी अचानक दिखती है वो भी घने पेड़ पौधो में...आखिर ऐसे बहुत से जीव-जंतु सब धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे है...क्यों....? क्या कारण है तर्क बहुत है पर सचाई एक की ईश्वर की बनी हुयी रचना हम सबने गलत प्रयोग किया...बनाया था सब ठीक पर किया हमने सब गलत....एक बात बताता हु कुंभलगढ़ की यात्रा के दौरान वक़्त था परशुराम जी के मंदिर जाने का एक जंगल रास्ता है लौटते वक़्त क्या देखता हु...एक बुजर्ग महिला सिर पर बोझा उठाये हुए चल रही थी हमसे आगे बढ़ते हुए...आगे चलकर एक जगह रोकी...क्या देखतें है...की बोझे को एक साइड रखकर वो खाने लगी पूछा आप प्रतिदिन ऐसे ही जाती है... उन्होने बताया हाँ ये मेरा प्रतिदिन का काम है...इसमें रोचक बात ये थी की हम सब थक चुके थे...पर वो मुस्कुराती हुयी खाना खा के फिर चल दी... देखा जाये अलग जगह खाना पान अलग है...पता लगाया की बिना यूरिया के यहाँ फसल होती है... हम तो सिर्फ जहर ही खा रहे थे... सोचिये ऐसी बहुत बातें है जो हमे है... इस लॉकडाउन में सोचिये क्या हमने सही किया क्या गलत... ?

नारद संवाद

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