देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreहम बचपन में एक सीधी-सी, बेरहम कहावत सुनते थे; “पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब।”
आज यह कहावत पुरानी नहीं हुई है, बस उसका अर्थ बदल गया है। अब खेलोगे-कूदोगे तो खराब नहीं बनोगे, करोड़पति बनोगे, विज्ञापन में दाँत दिखाओगे और बच्चों को पढ़ाई छोड़ने की प्रेरणा दोगे।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि पैसा मिलेगा या नहीं। पैसा चाहिए तो नेतागिरी करो। मत पूछो, दिमाग का क्या होगा? अंग्रेजी कहावत है फॉर्च्यून फेवर्स फूल्स!!
भारत के अधिकांश खेल सितारे बचपन से ही मैदानों में डाल दिए गए। किताबें बैग में नहीं, अलमारी में पड़ी रहीं। कॉलेज, रिसर्च, बहस, दर्शन, ये सब उनके जीवन से बाहर रहे। इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। दिन में छह घंटे ट्रेनिंग के बाद कोई हेगेल या न्यूटन पढ़ने नहीं बैठता।
नतीजा साफ है। शानदार खिलाड़ी तो पैदा हो रहे हैं, आईपीएल को ही देख लो। ठोकू बल्लेबाज वैभव छाए हैं, लेकिन एक भी वैज्ञानिक, इंजीनियर या विचारक नहीं। इंडियन आइडल हो या इंडिया गॉट टैलेंट्स, नचिकाइएं, मटकाइए, गाइए या भटकाइए, पैसा ही पैसा है। पढ़ लिख कर क्या करोगे बाबूजी?
ज़रा सिनेमा की तरफ़ चलिए, जहाँ “पढ़ाई की ज़रूरत ही क्या है” वाला दर्शन पूरी शान से राज करता है। अमिताभ बच्चन कॉलेज छोड़कर सुपरस्टार बने। धर्मेंद्र सीधे खेत से फ़िल्म सेट पर आ गए। सलमान खान, अक्षय कुमार, कंगना रनौत, कैटरीना कैफ, इनमें से किसी को भी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी ने नहीं गढ़ा। कैमरा, स्क्रिप्ट और तालियों ने सब सिखा दिया। यहाँ शिक्षा नहीं, एक्सप्रेशन चलता है। तर्क नहीं, टाइमिंग बिकती है। ज्ञान नहीं, जिम बॉडी मायने रखती है। पारिवारिक रिश्तेदारियां, संबंध, संपर्क, यही काम आते हैं, शिक्षा, ज्ञान नहीं।
हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जहाँ बच्चे कहते हैं, “पढ़कर क्या करेंगे? विराट बनेंगे।”
“डिग्री क्यों चाहिए? हीरो बनेंगे।”
कोई नहीं कहता, “पढ़ेंगे ताकि सवाल पूछ सकें।”
“सीखेंगे ताकि सिस्टम बदल सकें।”
सच यह है कि मैदान और मंच एकाग्रता सिखाते हैं, लेकिन विचार नहीं। वे प्रदर्शन पैदा करते हैं, विवेक नहीं। जो बच्चा दस साल की उम्र में सिर्फ़ जीतना सीखता है, वह चालीस की उम्र में भी सिर्फ़ जीतना ही चाहता है, सोचना नहीं।
तो पुरानी कहावत गलत नहीं थी।
बस हमने उसे समझना छोड़ दिया।
पढ़ोगे-लिखोगे तो नवाब नहीं, नागरिक बनोगे। खेलोगे-कूदोगे तो खराब नहीं, पर अक्सर एक-आयामी बनोगे। और एक-आयामी समाज, चाहे वह कितना ही फिट और फ़ेमस क्यों न हो, आख़िरकार सोचने में कमजोर ही रहता है।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज का भारत इस पूरी स्थिति पर गर्व करता है। हम गर्व से कहते हैं, “देखो, वह दसवीं पास भी नहीं है, फिर भी करोड़ों कमाता है।” मानो पढ़ा-लिखा होना कोई शर्म की बात हो गई हो। टीवी डिबेट्स में खिलाड़ी और अभिनेता राष्ट्रीय मुद्दों पर राय देते हैं, और एंकर सिर हिलाकर मान लेते हैं कि प्रसिद्धि अपने आप में ज्ञान का प्रमाण है। अब ज्ञान की जगह “अनुभव” ने ले ली है, वह अनुभव जो सिर्फ़ शूटिंग फ़्लोर या पिच तक सीमित है। किताबें भारी लगती हैं, सवाल असुविधाजनक लगते हैं, और सोचने वाले लोग “ओवरथिंकर” कहलाते हैं।
हम बच्चों को यह नहीं बताते कि हर विराट कोहली के पीछे लाखों ऐसे विराट हैं जो न खेल पाए, न पढ़ पाए। मैदान सबको नहीं अपनाता, लेकिन शिक्षा कम से कम दरवाज़ा तो खोलती है।
कहावत आज भी सही है, गलत हमने अपनी प्राथमिकताएँ कर ली हैं। निम्न सभी स्पोर्ट्स पर्संस ने अपने खेल में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन औपचारिक शिक्षा बहुत सीमित रही। ज्यादातर ने स्कूल या कॉलेज बचपन में ही छोड़ दिया ताकि खेल पर पूरा ध्यान दे सकें। इससे यह सिद्ध होता है कि यदि मैदान पर लगातार खेलते रहें, तो शिक्षा, विज्ञान, इंजीनियरिंग या बौद्धिक क्षेत्रों में सफल होना कठिन हो जाता है। भारतीय उदाहरणों में शामिल हैं: सचिन तेंदुलकर (१०वीं के बाद ड्रॉपआउट), एमएस धोनी, विराट कोहली (१२वीं तक), कपिल देव, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, हार्दिक पंड्या (९वीं के बाद), उमेश यादव, ऋषभ पंत, नीरज चोपड़ा, मैरी कॉम (मैट्रिक फेल), मिल्खा सिंह, पीटी उषा, दीपिका कुमारी, विजेंदर सिंह, ध्यानचंद, साइना नेहवाल, योगेश्वर दत्त, रवि दहिया और जहीर खान। अंतरराष्ट्रीय नाम: लियोनेल मेसी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो, माइक टायसन, लेब्रॉन जेम्स तथा उसैन बोल्ट। ये सभी खेल के महानायक बने, पर उच्च शिक्षा या अन्य क्षेत्रों में नहीं जा सके। आजकल ऐश में हैं।













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