देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreआज जाने लगे...पैरों में छाले पड़ गए...फिर भी न रोकें...क्योंकि मिलों का सफर है...क्या पता मंजिल तक पहुंच पाएं...क्या पता कही सड़क किनारे पड़ा मिलो...ये एक-एक प्रवासी मजदूर..की अलग अलग बातें है...प्रवासी मजदूर एक पहचान...इससे पहले हमारी पहचान सिर्फ इतनी थी कि हम बिहार से है, मध्यप्रदेश है, उत्तर प्रदेश है, बहुत सारी जगहों आतें है...पर आज हम प्रवासी है...जब सड़क पे निकल रहे तो मददगार भी है...और हीन दृष्टि से देखने वाले भी...सरकारें आती जाती रही हम वही रहे..गरीबी की बात सबने की पर हम वही खड़े रहे...नए-नए सपने हम ही दिखाए गए..फिर भी हम वही खड़े रहे..हवाई जहाजों की बात कही गयी..पर आज तो एक बस भी न मिली...सफर हमारा चलता गया...पर हम नही थके...ये सारे बोल एक प्रवासी मजदूर के है जो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ के एक गांव के रहने वाले सत्य प्रकाश है जो पहले गांव में ही शिक्षक थे..(प्राइवेट)....पर समय की मार की वजह से बाहर निकलना पड़ा...आज फिर वापस चल दिये...पहुंच गए तो अब लौटेंगे नही...मैंने पूछा क्यों...सिर्फ आँखों मे हल्के आँसू निकल आये...।













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