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वह खौफनाक रात हमारा पीछा कर रही है

मार्च 2020 की वह काली रात याद है? सन्नाटा चीरती एंबुलेंस की चीखें। वीरान सड़कें, बंद हवाई अड्डे, ताले लगे स्कूल, अस्पतालों के बाहर मौत का इंतज़ार करती कतारें। एक खांसी डर बन जाती थी, एक छींक आफत। लोग अपने ही घरों में क़ैद थे, परिवार दूर, डॉक्टर-नर्सें टूटते जा रहे थे। कई लोग अपनों को आखिरी बार छू भी नहीं सके।


दुनिया उस बुरे सपने से बाहर तो निकल आई, लेकिन उसके सवाल अब भी जागते हैं। वायरस आया कहां से? प्रकृति से, या इंसान और वन्यजीवों के बढ़ते टकराव से? यह वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना थी, या इसमें किसी प्रयोगशाला की भी भूमिका रही? छह साल बाद भी इनका पूरा जवाब हमारे पास नहीं है।
मास्क गायब हो चुके हैं, हवाई अड्डे फिर भीड़ से भरे हैं, बच्चे स्कूल लौट आए हैं ,  मगर सामान्य जीवन का लौटना सवालों का अंत नहीं है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र को कोविड-19 की उत्पत्ति और महामारी से निपटने के तरीके की एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय जांच का समर्थन करना चाहिए। यह किसी को दोषी ठहराने की मांग नहीं, सच जानने की मांग है।

SARS-CoV-2 अचानक सामने आया और पूरी दुनिया में फैल गया। प्राकृतिक उत्पत्ति की संभावना आज भी गंभीरता से मौजूद है, और प्रयोगशाला दुर्घटना की बहस भी खत्म नहीं हुई ,  लेकिन किसी एक को निर्णायक रूप से साबित करने वाला पूरा प्रमाण अब तक सामने नहीं आया। यह फर्क समझना ज़रूरी है: प्रयोगशाला की संभावना का मतलब जानबूझकर वायरस फैलाना नहीं, और रहस्य बने रहना अपने आप में साजिश का सबूत नहीं। पर इतनी बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी के साथ अनिश्चितता को हमेशा के लिए स्वीकार भी नहीं किया जा सकता। शुरुआती आंकड़ों, नमूनों और रिकॉर्ड तक पहुंच पर सवाल उठते रहे हैं। कोई निश्चित मध्यवर्ती पशु मेजबान भी आज तक नहीं मिला। दुनिया को अटकलें नहीं, सबूत चाहिए।

किसी के लिए यह कुछ दिनों की खांसी थी, किसी दूसरे के लिए मौत। कुछ स्वस्थ लोग अचानक गंभीर हालत में पहुंचे, तो कुछ संक्रमित परिवार के साथ रहकर भी बचे रहे — इन्हें अनौपचारिक रूप से "सुपरडॉजर" कहा गया। उम्र, जेनेटिक्स और प्रतिरक्षा इस अंतर की काफी हद तक व्याख्या करते हैं, फिर भी विज्ञान अब तक इस पहेली के सारे टुकड़े नहीं जोड़ पाया , एक ही वायरस किसी में हल्का तूफान क्यों बनता है और किसी दूसरे में तबाही?

लाखों लोगों के लिए कोविड बुखार उतरने के साथ खत्म नहीं हुआ। थकान, सांस फूलना, ब्रेन फॉग, नसों की परेशानी ;  आज इसे लॉन्ग कोविड कहा जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव, लगातार सूजन, ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया और शरीर में वायरस के अवशेष रहने जैसी कई परिकल्पनाएं जांची जा रही हैं, पर एक भी सार्वभौमिक व्याख्या, आसान जांच या जादुई इलाज नहीं मिला। लाखों के लिए यह रहस्य आज भी निजी त्रासदी है।

आधिकारिक आंकड़े ही भयावह हैं, पर असली कीमत कहीं ज्यादा हो सकती है। अतिरिक्त मृत्यु दर के अध्ययन बताते हैं कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मौतें दर्ज संख्या से काफी अधिक रही होंगी। कुछ अस्पताल न मिलने से मरे, कुछ ऑक्सीजन के अभाव में, कुछ का टला कैंसर इलाज या ऑपरेशन जानलेवा साबित हुआ, कुछ बुजुर्ग बिल्कुल अकेले चले गए। और आंकड़ों से बाहर भी एक विशाल नुकसान हुआ ;  पढ़ाई रुकी, रोजगार गए, अकेलापन और मानसिक आघात बढ़ा। महामारी की पूरी कीमत शायद अब तक गिनी ही नहीं गई।

आंकड़े उस दर्द को नहीं बताते जो अस्पतालों के भीतर था। मरीज परिवार का हाथ थामे बिना मर रहे थे, रिश्तेदार मोबाइल स्क्रीन पर आखिरी बार अपनों को देख रहे थे, डॉक्टर-नर्स लगातार काम करते हुए इस डर में जी रहे थे कि संक्रमण उनके घर न पहुंच जाए। जो बचकर लौटे, उनमें से कई तुरंत सामान्य जीवन में नहीं लौट पाए ,  कमजोरी, डर और सामने हुई मौतों की यादें आज भी उनका पीछा करती हैं। कोविड सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं था; यह डर, अकेलेपन, शोक और इंसानी सहनशक्ति की वैश्विक परीक्षा थी।

इंसान दशकों से जंगल काट रहा है, वन्यजीवों के करीब बढ़ रहा है, शहर लगातार फैला रहा है ,  इंसान और दूसरे जीवों के बीच दूरी घट रही है। ऐसे में नई संक्रामक बीमारियों का खतरा काल्पनिक नहीं है। हो सकता है कोविड इस बढ़ते असंतुलन की चेतावनी हो, या वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना हो, या मानव गतिविधियों ने किसी प्राकृतिक जोखिम को वैश्विक आपदा में बदलने में भूमिका निभाई हो। सच जो भी हो, हमें पूरी तरह मालूम नहीं ,  और यही वजह है कि जांच जरूरी है।

दुनिया कोविड को भूलना चाहती है, यह स्वाभाविक है। पर इतिहास को भूलना अगली त्रासदी को न्योता देना है। हमें उत्पत्ति पर पारदर्शिता चाहिए, बेहतर महामारी निगरानी चाहिए, मजबूत जैव-सुरक्षा चाहिए, लॉन्ग कोविड पर गंभीर शोध चाहिए, और यह जांचने की ज़रूरत है कि कुछ देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं संकट में इतनी जल्दी क्यों चरमरा गईं। यह जांच किसी सरकार, संस्था या विचारधारा के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए ,  स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय और सबूतों पर आधारित होनी चाहिए। यह किसी पसंदीदा सिद्धांत को सही ठहराने या साजिश की कहानियां फैलाने की कवायद नहीं, तथ्यों की तलाश है।
विज्ञान तब कमजोर नहीं होता जब वह कहता है "हमें नहीं पता" ,  वह तब मजबूत होता है जब कहता है "आइए, पता लगाते हैं।"
एक अदृश्य सूक्ष्म जीव ने अर्थव्यवस्थाएं रोक दीं, शहर खाली कर दिए, परिवार बांट दिए, और उस सभ्यता के अहंकार को चोट पहुंचाई जो मानती थी कि उसने प्रकृति को काबू में कर लिया है। सच जो भी हो, उसे जानना ज़रूरी है ,  क्योंकि अगली महामारी शायद हमें छह साल का समय न दे।
छह साल बाद दुनिया आगे बढ़ चुकी है, पर कोविड के सवाल अब भी जिंदा हैं। उन्हें दफनाने के बजाय, अब समय है उनका सामना करने का। संयुक्त राष्ट्र निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच का रास्ता खोले। इतिहास को जवाब चाहिए, भविष्य को सबक।

नारद संवाद

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