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विश्वासघात जैसी मानसिकता से ग्रसित है

मनोजव नाम के इंद्र विराजमान थे.....जैसा कि हम जानते है की इंद्र देव स्थाई नहीं होते है अलग अलग काल खंड में वो बदलते रहते है...हमेशा की तरह इंद्रदेव अहंकार और घमंड में आए हुए थे....तभी कर्म प्रधान देवता हैं शनिदेव ने उन्हें कर्म का पाठ पढ़ाया पर वो अहंकार वश उनको नही समझ सके....खेर उन्होंने स्वर्ग के नीचे बने स्थान जिसे इंद्र नरक की संज्ञा दी गई है उन्होंने उनको वहीं पहुंचा दिया....वहां देखा कई नरकंकाल पड़े है...कोई उजाला नही सिर्फ अंधेरा और घुटन भरा प्रभाव खेर इंद्र देव ने आवाज लगाई कोई है यहां उनसे मिलने एक बुजुर्ग अवस्था में व्यक्ति आया जो किसी काल में इंद्र रह चुके थे...उन्होंने उनको बताया की आप वर्तमान इंद्र है वो बोले हां दूसरे इंद्र बोले में किसी काल में इंद्र था....तो पहले वाले इंद्र ने पूछा ये आपकी ऐसी दुर्दशा क्यों...तो उन्होंने बोला की मेने अपने पद की गरिमा न रखकर इंद्र के भोग विलास में अपना समय गवाया और बहुत अधर्म के काम किए जिसकी वजह से मुझे सह शरीर यहां भेजा गया....तो जो वर्तमान इंद्र थे वो बोले ये कांकल किस के है....तो भूतकाल के इंद्र ने बताया ये सभी इंद्र है अपने अपने कल्प के ये सभी भी धर्म के मार्ग पे न चलकर अधर्म का कार्य करते थे.....इसलिए ये सभी इसी जगह मौजूद है....खेर वर्तमान काल के इंद्र उस जगह से स्वर्ग वापस आए उन्होंने कर्म अधिकारी शनि देव से क्षमा मांगी और अपने किए गए अधर्म के कार्यों का पछतावा करने का उपाय पूछा.....शनिदेव ने उन्हें कर्म की महिमा समझाई और बताया की कर्म किसी को नहीं छोड़ता चाहे त्रिदेव ही क्यों न हो.....तो आज इस धरा पे इंद्र जैसे सुख सुविधा में भोगने वाले लोगो के लिए ये कहानी है....इंद्र की गद्दी तपस्या के प्रभाव से ही मिलती है...इस धरा पे कलयुग में तमाम इंद्र है पर सभी छल, धोखा, झूठ, दिखावा और विश्वासघात जैसी मानसिकता से ग्रसित है....ये सभी धर्म की आड़ में अपने कर्मों को नहीं छुपा सकते....आज इस काल में ये चरित्र से गिरे हुए और अपने कर्म से भटके हुए है....अगर कोई सोचे की मेरे रोज अच्छे कर्म करने से जैसे सोचे की आप गंगा स्नान कर लू, बहुत सारा पुनः कर लू, गरीबों को भोजन करा दू, भंडारे कर लू, रोज दीपक जलाओ, रोज आरती करो, परिक्रमा लगाओ, दर्शन भगवान के नित्य करो चार धाम यात्रा कर लू... इन सब धर्म से किए गए कार्यों का कर्म फल जरूर मिलेगा पर किए गए अधर्मी कर्म नही कटेंगे.....ये अब तक पढ़े हुए ग्रंथों की बात कही मेने.....और आखिरी बात जीवन चक्र में हमारे नारायण को भी कर्म के अनुसार इस धरा पे अलग अलग जन्म लेना पड़ा और अपने भोग काटने पड़े तो हम साधारण जीवों की क्या बिसात है खेर कर्म का लेखा नहीं मिटता मिटाने से उसका तो भोग भोगना होगा अपने सह शरीर से......आगे हरि इच्छा.... हरिबोल

 

 

नारद संवाद

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