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शक्ति उपासना के तौर पर की जाती है माता की पूजा, ऐसे करें कलश स्थापना

नवरात्र में शक्ति उपासना के तौर पर माता दुर्गा की उपासना की जाती है। महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में साधक अपने विभिन्न इष्ट के रूप में माता की पूजा अर्चना करते हैं। माता काली की पूजा भी साधक इस समय बहुत तेज कर देते हैं ताकि तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त हो सकें। मां बंगलामुखी उपासना की जाती है। कई लोग सफलता की प्राप्ति हेतु इस समय बगलामुखी अनुष्ठान विधिवत करवाते हैं। इन्हीं दिनों में साबर मंत्र की सिद्धि भी की जाती है। वहीं अष्टमी की रात्रि में दुर्गासप्तशती के प्रत्येक मंत्र को विधिवत सिद्ध किया जाता है। सप्तश्लोकी दुर्गा के पाठ का 108 बार अष्टमी की रात्रि में पाठ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। त्रिक मंत्रों में ग्रहों के बीज मंत्र के तांत्रिक प्रयोग भी होते हैं। नवग्रहों की लकड़ियों से हवन करके नवों ग्रहों को प्रसन्न किया जाता है। महामृत्युंजय मंत्र की साधना भी की जाती है। इस मंत्र के साथ-साथ लघु मृत्युंजय मंत्र की साधना भी की जाती है।

शक्ति उपासना के महापर्व शारदीय नवरात्र में देवी आराधना का महत्व है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ अलग-अलग स्वरूप के दर्शन का विधान है। प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना से पूजा की शुरुआत होती है। इस दिन लोग घरों में कलश स्थापित कर देवी का आह्वान करते हैं और फिर नौ दिनों तक उनकी पूजा की जाती है।


नवरात्र में कलश स्थापना से देवी प्रसन्न होती है। कलश स्थापना के लिए मिट्टी का घड़ा, जौ, गंगा की शुद्ध माटी, नारियल, कलावा, लाल चुनरी, गंगा या किसी पवित्र नदी का जल, सुपारी, अक्षत, दीये और घी ये जरूरी सामान है। नवरात्रि के पहले दिन प्रात:काल जल्दी उठकर अपने नित्य कर्मों से निवृत होने के बाद स्नान कर लें और मां दुर्गा के नाम नौ दिन के लिए अखंड दीपक जलाएं। कलश स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में मिट्टी डाल लें और उसमें जौ के बीज बो दें। फिर उसके बाद तांबे के लोटे या मिट्टी की कलश पर रोली से स्वास्तिक बना दें और कलश के ऊपरी हिस्से यानी कंठ वाले भाग में मौली बांध दें। अब कलश में गंगा जल के जल को मिलाएँ, फिर उस पर रुपया, दूर्वा, सुपारी और चावल रख दें। इसके बाद कलश में पंचपल्लव या आम के पांच पत्ते लगा डाल दें और नारियल को लाल कपड़ा लपेटकर उस पर भी मौली बांध दें। अब कलश को मिट्टी के उस पात्र के ठीक बीचों बीच रख दें, जिसमें आपने जौ बोएं हैं। कलश स्थापना के बाद फिर मां भगवती को प्रणाम करते हुए अपने व्रत को आरम्भ करें ।

अंखड दीप है जरूरी


इसके बाद दिये में अखंड दीप जलाना चाहिए और फिर धूप अगरबत्ती से उनकी पूजा करनी चाहिए। पूरे नौ दिनों तक देवी के पूजा का ये क्रम अनवरत चलना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इसके देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मुरादें पूरी करती हैं। कलश स्थापन मुहूर्त

कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त मध्याह्न 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक का समय है। धर्मशात्रीय मत के अनुसार चित्रा नक्षत्र में कलश स्थानपा प्रशस्त नहीं माना जाता है। इसलिए दिन में सायं 6 बजकर 43 मिनट तक चित्रा नक्षत्र है। उसके बाद कलश स्थापना किया जा सकता है ऐसा करने से घर में सुख, शान्ति, धन, ऐश्वर्य की वृद्धि होती है एवं मां भगवती मनोकामना पूर्ण करती है । 20 अक्टूबर शुक्रवार को बिलवाभिमंत्रण,देवी बोधनं, आमंत्रण। 21 अक्टूबर शनिवार को पत्रिका प्रवेश, पूजन मूर्ति स्थापन के बाद पट खुलते ही भक्त देवी दर्शन कर सकेंगें और रात्रि में महानिशा पूजन की जाएगी।


आलेख में दी गई जानकारियों को लेकर हम यह दावा नहीं करते कि यह पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

 

साभार-khaskhabar.com

 

नारद संवाद

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