देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreबालीबुड यानि सिने जगत में जिन लोगों ने मथुरा का नाम रोशन किया है उनमें डा० अचला नागर के नाम का स्मरण न किया जाए यह संभव नहीं । सन १९३९ में जन्मी अचला नागर बालीबुड की दुनिया में रच-बस गई हैं , वे करीब ३२ फिल्मों की पटकथा लेखिका हैं । अचला जी लिखी फिल्मों मसलन 'निकाह' ;निगाहें' 'नगीना ' 'आखिर क्यों ' 'बागबान' 'तोफहा' ' ईश्वर ' आदि में अमिताभ बच्चन , हेमा मालिनी , सलमान सरीखे सुपर सितारों ने काम किया है। छोटे परदे के कई सीरियल भी लिखे है अचला जी ने । लिस्ट लम्बी है । अचला जी को मथुरा से बेहद लगाव है । वजह साफ़ है ----- अचलाजी ने रंगमंच की दुनिया में पहला कदम मथुरा में ही रखा था । मानवीय संवेदनाओं का समंदर बहता दिखाई देता है इनके निर्मल हृदय में । फिल्मों की कहानी लिखते लिखते वे खुद कहानी बन गई है।यह कहानी एक नारी के संघर्ष की , सपनों की , जिजीविषा की , इंसानी रिश्तों के टूटने - बिखने और फिर जुड़ने की एक बेमिसाल कहानी है जो निश्चय ही भटकती नौजवान पीढ़ी के लिए सदियों तक प्रेणनाप्रद साबित होगी । ८० बसंत देख चुकी अचला जी की जीवन यात्रा को मैं ३ भागों में देखकर रोमांचित होता हूँ । पहला अपने प्यारे बाबूजी ( श्री अमृत लाल नागर ) के साथ लखनऊ में बिताया वक्त जहाँ अचलाजी ने साहित्य की दुनिया में कदम रखा । दूसरा ,मथुरा प्रवास जहाँ आकाशवाणी में उनकी रचनात्मक कलात्मक और साहित्यिक सेवाओं का दौर प्रारम्भ हुआ । तीसरा ,मुंबई की फ़िल्मी दुनिया । मथुरा में नौकरी शुरू की तो शहर में रंगमंच' की गतिविधियों को तीव्र कर दिया ।आकाशवाणी में रहते अचला जी ने खुद तो तपस्या की ,साथ ही अनेक नौजवानों को अभिनय और लेखन की प्रेणना दी । लगभग चार दशक पुरानी बात है। आकाशवाणी पर 'हवा महल' कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय था । दिल्ली केंद्र से प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम में एक १५ मिनट की हास्य नाटिका का प्रसारण होता था और देश के सभी केंद्र इसको रिले करते थे । रेडियो प्रेमी इस घडी का बेसब्री से इन्तजार करते थे । मैं मथुरा आकाशवाणी का वार्ताकार था सो अचला जी से मुलाकात होती थी ।। हवा महल में अधिकांश झलकियां आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र पर तैयार की जाती थीं । अचला जी ने मथुरा के लोगों को आगे बढ़ाया , लेखकों से विषय सुझाकर झलकियों को लिखवाया और फिर शहर के कलाकारों को उस झलकी में डायलॉग बोलने का अवसर दिया । सभी को पारिश्रमिक भी मिलता था । उन्होंने मुझे कई रोचक विषय दिए और उनपर १५ मिनट की हास्य नाटिका लिखवाई । अचला जी बताती थी कि विषय को कैसे बढ़ाते है , संवाद कैसे होने चाहिए आदि। मैंने एक दर्जन से अधिक झलकियां लिखी जिन्हे अचलाजी ने बड़े श्रम से स्टूडियो में तैयार किया और फिर उनका प्रसारण दिल्ली केंद्र से हुआ । अंधविश्वासों पर चोट करती झलकी '' पीपल का भूत'', छोटे कद के लोगो के जीवन में आने वाली दिक्कतों पर '' अंगना में गिल्ली खेले मेरो छोटो सा बालमा '' , कुत्तों को पालने वाले लोगों पर व्यंग करती झलकी '' विज्ञापन का कमाल '' उस वक्त हिट हुई , कई बार प्रसारित हुई। मेरे जैसे अनेक लोग जिन्हे अचला जी का लेखन में निर्देशन मिला आज भी उनका स्मरण बड़ी श्रध्दा से करते हैं।
एक किस्सा और --- साहित्य की दुनिया में एक धमाका था अमृत लाल नागर का कालजयी उपन्यास '' खंजन नयन ''। महाकवि सूरदास के जीवन पर लिखा गया यह अद्भुत उपन्यास जन्म ही न लेता यदि अचला जी मथुरा में न होती। नागर जी को इस उपन्यास को लिखने की प्रेणना मथुरा में एक गोष्ठी में मिली थी। यह किस्सा बहुत रोचक है । मथुरा की साहित्यिक -सांस्कृतिक संस्था '' जन सांस्कृतिक मंच '' ने नागर जी को अपनी एक गोष्ठी में आमंत्रित किया था । तब नागर जी तुलसीदास के जीवन पर उपन्यास '' मानस के हंस '' लिख चुके थे । यह उपन्यास साहित्य जगत में बेहद चर्चित हो चुका था। नागर जी ने मंच की गोष्ठी में अपने भाषण को समाप्त किया तो सवाल- जबाब का सत्र शुरू हुआ । एक सज्जन ने सवाल दाग दिया ------'' आपने तुलसी बाबा पर तो लिख दिया लेकिन सूर को क्यों छोड़ दिया , शायद इसलिए वे अंधे थे ''। सवाल चुभता था ,नागर जी हतप्रभ हो गए , भावुक दिखाई दिए । तनिक देर मौन रहे फिर अपनी दाईं भुजा को मथुरा में बहने वाली यमुना की तरफ उठाते हुआ कहा -----'' कसम खाता हूँ , लिखूँगा और जरूर लिखूँगा ''। गोष्ठी में सन्नाटा पसर गया ।
कुछेक माह बाद नागर जी ने मथुरा में अपनी लाड़ली बिटिया अचला के घर पर डेरा डाल दिया और अपने वचन का बखूबी निर्वाह किया । मुझे मालूम है कि अचला जी यदि मथुरा में न होती तो नागर जी को इस उपन्यास को लिखने में अधिक वक्त लगता । नागर जी सूरदास की कर्मस्थली पारसौली में जाकर उस स्थान पर बैठ जाते जहाँ सूरदास अपने पदों का गान करते थे , कुछ पन्ने लिखते और फिर घर आकर अपनी बेटी से सूरदास के जीवन की घटनाओं पर विचार -विमर्श करते । अचला जी की हर कहानी में समाज और परिवार की विसंगति - विडंबनाओं की दास्तान है । अचला जी कहती है कि फिल्म में मनोरंजन जरूरी है लेकिन वह फिल्म बेमानी है जो कोई सन्देश न दे । स्थापित कलाकारों और लेखकों का कद उस वक्त और बड़ा होता है जब वे अपने लेखन के साथ नए लेखकों और कलाकारों की प्रतिभा को निखारने का काम भी करते हैं । इस मायने में अचला जी की कोई सानी नहीं ।













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