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इंश्योरेंस कर्मचारियों ने किया निजीकरण का विरोध

मथुरा। इंश्योरेंस कंपनियों के निजीकरण की प्रक्रिया का विरोध शुरू हो गया है। जनरल इंश्योरेंस कर्मचारियों ने कार्यालय पर ताला डालकर इस प्रक्रिया का विरोध किया। वहीं एलआईसी कर्मचारियों ने निजीकरण के विरोध में धरना देकर नारेबाजी की और कहाकि एलआईसी धारकों को इससे बड़ा नुकसान होगा। सौंख अड्डे के समीप एलआईसी कार्यालय पर एलआईसी कर्मचारियों ने निजीकरण के विरोध में धरना प्रदर्शन किया गया। एलआईसी कर्मचारियों ने प्रदर्शन के दौरान यह भी बताया कि निजीकरण से बीमा धारकों को भी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
एलआईसी कर्मचारियों के द्वारा बताया गया कि सरकार के द्वारा अपनी मनमानी के चलते सभी विभागों का निजीकरण किया जा रहा है। इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया जा रहा है। अगर एलआईसी विभाग निजीकरण हो गया तो इससे बीमा धारकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा। एलआईसी कर्मचारी रवि प्रकाश भारद्वाज और केएच पांडे ने बताया है कि अगर एलआईसी विभाग एवं अन्य विभाग निजीकरण में चले गए तो कर्मचारियों को तो नुकसान का सामना करना पड़ेगा। लेकिन इसके साथ-साथ अन्य जनमानस को भी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है।
एलआईसी कर्मचारियों ने रखी ये मांगें एलआईसी कर्मचारियों ने मांग रखी है कि सरकार के द्वारा अपनी हिस्सेदारी न बेची जाए और आईपीओ लाया जाए और बीमा प्रीमियम से जीएसटी वापस ली जाए, आयकर छूट हेतु अलग धारा बनाई जाए। इस दौरान रवि प्रकाश भारद्वाज, निदेश कुमार पालीवाल, आर.आर उपाध्याय, बैंककर्मचारी नेता बामन जी चतुर्वेदी, केएच पाण्डेय, भूपेन्द्र सैनी, अनिल रावत, रंजीत जादौन, अजय शर्मा, आनंद मीना, डीएस मीना, कविश उपाध्याय, चंदन सिंह, सूरज यादव, एश्वर्य प्रताप, रविन्द्र कुमार, राजकुमार गुप्ता, कुलभूषण शर्मा, राकेश, अखिलेश सक्सेना, सतेन्द्र शर्मा, कालीचरण, राजेश आदि मौैजूद रहे।
 वहीं जनरल इंश्योरेंस कर्मचारिया ने भी निजीकरण का विरोध किया। कर्मचारियों का कहना था कि इससे भी ज्यादा हडतालें होंगी। जब तक सरकार सार्वजनिक बीमा कंपनियांे के निजीकरण की प्रक्रिया से कदम वापस नहीं खींचती है। चारों कंपनियों का वेतनमान अगस्त 2017 से लंबित है। पेंशन स्कीम भी लागू किये जाने की मांग की गई है। साधारण बीमा कर्मचारी को पैंशन का लाभ कम मिल पाता है। राष्ट्रीयकरण इस लिए किया गया था कि गरीब और निम्न तबके के लोगों को योजनाओं का लाभ मिल सके। केंद्र सरकार कहती है कि सार्वजनिक कंपनियां घाटे में चल रही हैं जबकि इसके लिए खुद सरकार ही जिम्मेदार है।

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