देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreदेश भर में सरकारी और निजी अस्पतालों के संचालक कोरोना के मरीजों को एक डरावनी आफत मान रहे हैं लेकिन मथुरा के के डी मेडिकल कालेज से जुड़ा अस्पताल संकट के इस काल में एक वरदान बनकर प्रकट हुआ है। मथुरा के जिला अस्पताल के अतिरिक्त जिला प्रशासन ने जिले के दो मेडिकल कालेज के अस्पतालों को केविड सेंटर बनाया था।
इनमें के डी अस्पताल तो पिछले डेढ़ माह से कोरोना के मरीजों के उपचार में जी जान से जुटा है जबकि सोंख रोड स्थित दूसरे अस्पताल में कोरोना का एक भी मरीज आज तक भर्ती नहीं हुआ है। राहत और ख़ुशी की बात यह है चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण '' के डी अस्पताल'' से ढाई दर्जन कोविड मरीज उपचार उपरान्त सकुशल घर वापस जा चुके हैं जबकि आज इतने ही मरीज यहाँ भर्ती हैं। इन मरीजों में शहर के प्रसिध्द वकील और '' मथुरा बार एसोसिएशन '' के पूर्व अध्यक्ष महेश्वर नाथ चतुर्वेदी के अतिरिक्त अस्पताल के वाइस चैयरमेन स्वयं भी शामिल हैं।
हैरत की बात यह है कि मथुरा जनपद में करीब सवा सौ निजी अस्पताल (इनमें के कॉर्पोरेट कल्चर का २०० बिस्तर का अस्पताल भी है ) हैं जहाँ सामान्य दिनों में जटिल से जटिल रोगों के भरोसेमंद उपचार के विज्ञापन दिए जाते हैं लेकिन आज ये सभी अस्पताल इंसान द्वारा इंसान की सेवा से कन्नी काटे हुए है। इन सभी अस्पतालों के मालिक चिकित्स्कों को संक्रमण का भय सता रहा है। ऐसे में के डी मेडिकल अस्पताल के चिकित्स्कों द्वारा की जा रही चिकित्सा सेवाओं को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
इस अस्पताल के डाक्टर केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई गाइड लाइनों पर अमल करते हुए न केवल पी पी ई किट का स्तेमाल कर रहे हैं बल्कि यहाँ भर्ती मरीजों को भोजन , फल , चाय ,बिस्किट और मिनिरल पानी के साथ काढ़ा भी उपलब्ध कराया जा रहा है। मुझे मालूम हुआ है कि कोविड के कई ठीक हुए मरीजों को यदि वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ी तो उसका उपयोग भी किया गया।
हैरत की बात यह है कि यहाँ मरीजों के इलाज का सम्पूर्ण खर्चा निजी अस्पताल के खाते में जा रहा है। एक मरीज पर लगभग २५०० रु से ३००० रु रोजाना का खर्चा के डी मेडिकल कालेज वहन कर रहा है। हाँ , पी पी ई किट ,ग्लब्स और मास्क जिला प्रशासन ने उपलब्ध कराये हैं। वर्तमान में करीब ३५ पी पी ई किट रोजाना का प्रयोग हो जाता है। एक निजी अस्पताल यह खर्चा कब तक करेगा जबकि कोरोना की जंग फिलहाल खत्म होने वाली नहीं।
पिछले एक सप्ताह से इस अस्पताल में भर्ती कोविड के मरीज वकील महेश्वर नाथ चतुर्वेदी जिनके दोनों फेफड़ों में अच्छा खासा संक्रमण था और उनकी उम्र भी ६५ से अधिक है , प्रसन्न हैं और उनके मनोबल में कोई कमी नहीं हैं। महेश्वर नाथ अपने मित्रों से फोन पर बतिया रहे हैं और अस्पताल के चैयरमेन रामकिशोर अग्रवाल के गुणगान कर रहे हैं और अपनी तबियत का व्योरा कम दे रहे हैं।
वे अपने चिकित्स्क मित्र डा राज कुमार चतुर्वेदी से कह रहे हैं ----'' गुरू , यहाँ तो जो जरूरत पड़े , सो मिले। काढ़ा आवे, फल आवे , चाय और बिस्कुट आवे , पेट ख़राब था। जैसे ही कही वैसे ही डाक्टर ने दवा भेजी। '' डा ० राज कुमार चतुर्वेदी ने मुझे बताया कि ''महेश्वर उग्र स्वाभाव के है , बेबाक बोल के स्वामी हैं , किसी की बिना बजह की प्रशंसा से उन्हें परहेज है। के डी मेडिकल कालेज के इस अस्पताल द्वारा इस विपदा की घडी में की जा रही मानव सेवा और इंसानियत को महेश्वर खुद अपनी आँखों से देख रहे हैं , तभी मुक्त कंठ से राम किशोर जी का आभार प्रकट अस्पताल से मिलने वाली छुट्टी से पहले कर रहे हैं।
इस आलेख में राम किशोर जी से हुई संक्षिप्त बातचीत का स्मरण करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस कालेज में १२५ से अधिक चिकित्स्क है , अनेक ऐसे है जिनके पास देश भर के प्रतिष्ठित अस्पतालों में काम करने का प्रचुर अनुभव है। मानवीय आपदा के वक्त चिकित्स्क दूसरा भगवान माना जाता है , ऐसे में वह साधारण इंसान की तरह डर जाये या अपने कर्तव्य से विमुख हो जाये , यह समाज के प्रति अन्याय है। अस्पताल प्रशासन ने कर्तव्य से विमुख होने वाले कुछेक चिकित्स्कों की छुट्टी की है तो काम में जुटे चिकित्स्कों की पीठ थपथपाई है। यही कारण है के डी मेडिकल कालेज के चिकित्स्क एक 'वारियर' के रूप में मरीजों की चिकित्सा में जुटे हैं। समीर गौतम मेरे अनुज जैसे हैं। अस्पताल की प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभाल रहे हैं। मैंने पूछा ---'' तुम भी जुटे हो क्या ?'' समीर बोले --" कैसे न जुटूँ , चैयरमेन और एम् डी स्वयं एक एक चीज पर नजर रखे हैं और बारीक पूछताछ कर रहे है। "
शहर के प्रसिध्द एडवोकेट सुरेंद्र मोहन शर्मा जो अपने साथी महेश्वर नाथ की कुशलक्षेम लेते रहते हैं ने आज मुझे एक निजी कालेज द्वारा सार्वजनिक सेवा के द्वार खोले जाने की तारीफ करते श्री राम किशोर अग्रवाल का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा ऐसे इलाज के लिए दिल्ली और मुम्बई वाले भी तरस रहे हैं।













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