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पश्चिम के अन्धानुकरण से हुई भारतीय संस्कृति को क्षति

महामण्डलेश्वर स्वामी गुरू शरणानंद महाराज संगोष्ठी के दौरान बोलते हुए चार दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के विशेष सत्र में बोले महाराजश्री 

मथुरा। वर्तमान समाज में कत्र्तव्यबोधक ज्ञान के अभाव अर्थात् कत्र्तव्यों से विमुख होकर मात्र अधिकार तक स्वयं को केन्द्रित कर लेने के कारण ही तमाम समस्याएं खड़ी हो रही हैं। महावन कस्बा स्थित रमणरेती धाम स्थित उदासीन काष्र्णि पीठ में भारतीय दार्शनिक-अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के तत्वावधान में ‘आनन्द-मीमांसा’ विषय पर आयोजित 4 दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के विशेष सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए महामण्डलेश्वर स्वामी गुरु शरणानन्द जी महाराज ने स्पष्ट किया, ‘रोटी-कपड़ा और मकान, मांग रहा है हिन्दुस्तान’ मनुष्यत्व की गलत अवधारणा है । उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में हाथी - घोड़ा - धन - सम्पत्ति प्राथमिकता में नहीं है । मनुष्य में मनुष्यत्व होना चाहिए । उन्होंने कहा कि किसी विशेष उत्तरदायित्व के निर्वहन में जो सक्षम है, वे ही सच्चे अधिकारी भी हैं । भारतीय संस्कृति में, ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कह कर मात्र कत्र्तव्य पालन का निर्देश है, अधिकार तो स्वतः मिलेगा।

अपनी अपेक्षाएँ बहुत अधिक बढ़ाकर तथा पश्चिम का अन्धानुकरण करके हमने न सिर्फ अपनी संस्कृति को नष्ट कर लिया है, अपितु दृष्टि बदल जाने से कल्याण-कारी सृष्टि भी बदल रही है । यदि हम हर कार्य सर्वव्यापी परमात्मा को साक्षी मानकर करने लगे तो तमाम विकार स्वतः दूर हो जाएंगे, फिर हमसे न तो कोई पाप कर्म होगा और न ही समाज में कोई विकृति पैदा होगी ।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर सिद्धेश्वर भट्ट ने भी विभिन्न दर्शनों में आनन्द तत्व की विद्वत्ता पूर्वक विवेचना की । संचालन प्रो. विजय अजमानी ने किया।

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