देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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नई दिल्ली । समाजवादी पार्टी में मचा घमासान फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है। सोमवार को मुलायम अपना दुखड़ा लेकर दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचे तो आज बेटे अखिलेश की तरफ से साइकिल पर दावा ठोकने के लिए चाचा प्रोफेसर रामगोपाल यादव पहुंचे। इस बीच मंगलवार को दोनों धड़े में सुलह की एक और कोशिश नाकाम हो गई जब मुलायम और आजम खान के बीच होने वाली मीटिंग भी रद्द हो गई। आजम से मिले बिना ही मुलायम लखनऊ के लिए रवाना हो गए। बाद में यूपी के कैबिनेट मंत्री और सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान ने कहा, ‘मेरी भी अपनी सीमाएं हैं। मेरा मकसद था कि अखिलेश का निलंबन वापस हो जाए, इसमें कामयाबी मिली। माइनोरिटी वोट यह नहीं चाहेगा कि सपा सत्ता से जाए। मायूसी तो है, फिकरमंदी भी है, लेकिन अभी समय है। मैं आगे भी कोशिश करूंगा। अभी सब कुछ संभव है।’ उन्होंने कहा कि सुलह की कोशिश जारी रहेगी, सभी दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि सपा में सबकुछ हो सकता है, लेकिन जुदाई नहीं। उन्होंने कहा कि मुसलमान सपा के साथ हैं। चिट्ठी पर मुलायम सिंह के हस्ताक्षरों को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर उन्होंने कहा, ‘दो दस्तखत हैं, एक शॉर्ट फॉर्म में, एक फुल फॉर्म में। कहने वाले तो कुछ भी कहते हैं।’ चुनाव में किसको फायदा होगा, मुलायम को या अखिलेश को? इस सवाल पर आजम ने कहा कि चुनाव अभी बहुत दूर हैं, इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। बता दें कि इससे पहले जब मुलायम ने अखिलेश और रामगोपाल यादव को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर निकाल दिया, तो अगले ही दिन आजम नेताजी से मिलने के लिए उनके आवास पर पहुंचे। उसके बाद सुलह की कोशिश तेज हुई, जिसके तहत वह अखिलेश को लेकर मुलायम के पास आए और शिवपाल सिंह को भी वहां बुलाया गया। करीब एक घंटे चली बैठक के बाद शिवपाल ने अखिलेश और रामगोपाल के निष्कासन को रद्द करने का ऐलान किया। लेकिन बात तब और बिगड़ गई जब रामगोपाल के लखनऊ में बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुलायम को मार्गदर्शक बना दिया गया। शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया दिया गया और अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद उसी दिन, एक जनवरी को मुलायम ने फिर रामगोपाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
साभार-khaskhabar.com













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