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विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस: जानें 'ऑटिज्म' क्या अवस्था है और क्या है इसके लक्षण

 

आज 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस' है। ऑटिज्म क्या अवस्था है व इसके लक्षण क्या होते हैं और इसकी जल्द पहचान क्यों जरूरी है यह जानना हमारे लिए बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं इसके बारे में...

दरअसल, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर मानसिक विकास से सम्बंधित समस्या है जो समझने और दूसरों के साथ बातचीत करने से संबंधित व्यवहार पर प्रभाव डालती है। ऑटिज्म के विषय में जागरूकता जरूरी है। हर वर्ष '2 अप्रैल' को 'विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस' मनाया जाता है। इस बाबत अप्रैल के पूरे माह इससे से संबंधित कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक किया जाता है। 

क्या कहते हैं डॉक्टर्स  

'एम्स' की पीडिएट्रिक न्यूरोलॉजी डिवीजन की प्रमुख डॉक्टर शेफाली गुलाटी बताती हैं कि ऑटिज्म एक न्यूरो डवलेपमेंटल अवस्था है, जिसमें बच्चों में सामाजिक हाव-भाव सोशल इंटरेक्शन और संचार यानि कम्यूनिकेशन में गुणात्मक हानि होती है। ऐसे में इन बच्चों में रिपिटेटिव स्टीरियोटिपिक बिहेवियर्स होते हैं अर्थात बच्चों में दोहरावनीय व्यवहार होते हैं जैसे हाथ का हिलाना, बॉडी को शेक करना। 

ऐसे पहचाने बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण 
 
यदि 12 महीने का हो जाने के बाद भी बच्चा अपने नाम पर कोई रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा है और वह कुछ बड़बड़ाना शुरू नहीं कर पाया है, 14 महीने की उम्र तक उंगली से कोई इशारा नहीं कर रहा है, 16 महीने का होने पर एक शब्द नहीं बोल पा रहा या कभी कोई शब्द सीखे भी हैं और फिर उन्हें भूल गया है और अगर आप उससे कुछ पूछ रहे हैं जैसे कि "तुम्हारा क्या नाम है" तो जवाब देने की जगह बच्चा उस लाइन को दोबारा दोहरा रहा है तो बच्चे के ऐसे व्यवहार से पैरेंट्स को ऐसा लगना चाहिए कि कोई प्रॉब्लम तो नहीं है। ऐसे में वे अपने बच्चे को डॉक्टर से सम्पर्क करके उसे जरूर दिखाएं। ऑटिज्म के होने के संकेत बच्चे के जीवन में पहले के तीन वर्षों में ही दिखाई देने लगते हैं। लक्षण बच्चे के विकास के दौरान धीरे-धीरे नजर आते हैं। 

डॉक्टर शेफाली गुलाटी बताती हैं कि जब बच्चे को डाइग्नोस किया जाता है और उसे ऑटिज्म होता है तो उसमें सुधार के लिए एक इंडिविजुअल प्लान तैयार किया जाता हैं। इसके लिए उसके व्यवहार को लेकर जो भी परेशानियां होती हैं उन्हें सबसे पहले नोट किया जाता है। उसके बाद बच्चे के मानसिक स्तर के हिसाब से उन्हें सिखाया जाता है।  इसके बाद यह भी जरूरी रहता है कि हम उनको मेन स्ट्रीम स्कूल में डालें। 

ऑटिस्टिक बच्चे को उचित प्रशिक्षण मिलना जरूरी 

ऐसे बच्चों को यदि समाज में अल्टिमेटली इन्कलुशन में लाना है तो पहले उन्हें स्कूल में भेजें जहां वे कुछ न कुछ सीखना शुरू करें, फिर जैसे ही वह बड़ा होगा और किशोर अवस्था में पहुंचेगा और फिर उसके आगे जाने पर उसके लिए नौकरी का सोचें। अगर ऐसा बच्चा कुछ पढ़ कर कर सकता है तो उसे वोकेशनल ट्रेनिंग दिलाई जा सकती है। ऐसे में हमें यह देखना है कि हर बच्चे की क्षमता के हिसाब से जितना उसकी अधिकतम उन्नति हो सकती है उसे उस स्तर तक ले जाएं। ऑटिज्म के लक्षणों की जल्द पहचान, सही देखभाल और उचित इलाज से ऑटिस्टिक बच्चे के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।    

ऑटिज्म के प्रारंभिक लक्षण 

- बच्चे का 12 महीने का हो जाने तक कुछ इशारों का प्रयोग न सीखना 
- 12 महीने तक की उम्र तक शिशु का बड़बड़ाना शुरू न करना
- 16 महीने के शिशु का एक भी शब्द न बोल पाना या न सीखना 
- 24 महीनों से दो शब्द का सहज वाक्य न बोल पाना 
- लोगों से घुलने-मिलने व सामाजिक संचार कौशल में असमर्थ 
- इशारों से संयुक्त ध्यान न खींच पाना
- किसी भी उम्र में किसी भी भाषा या सामाजिक कौशल में असमर्थ 
- काल्पनिक खेल न कर पाना

नारद संवाद

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