देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreहम अपने परिवेश में दिन में कई बार मन शब्द का प्रयोग करते हैं। शिक्षित, जो धर्म शास्त्र का ज्ञान रखते हैं वे आत्मा शब्द भी बोलते हैं। लेकिन क्या है ये आत्मा और मन जिन्होंने गहराई से अध्ययन किया है उन्हें ही ज्ञान है.. अधिकतर को वास्तविक रूप से आत्मा और मन के वास्तविक स्वरूप के विषय में स्पष्ट जानकारी नहीं है। इस आलेख में आत्मा, मन क्या है यह स्पष्ट करने का प्रयास है।
उपनिषद "श्रीमद्भगवद गीता" में आत्मा और जीवात्मा को बहुत भली भांति वर्णित किया है।
मन और आत्मा को समझने के लिए हमें सबसे पहले मन को समझना होगा..... मन एक ऊर्जा है जिसे विद्युत तरंग के स्वरूप की मान सकते हैं। मन (तरंगों ) कोई नियंत्रण नहीं जैसे विद्युत को हम नियंत्रण में नहीं कर सकते। हां उसे सही स्वरूप में करने के लिए हमें विद्युत घर के उपकरण, ट्रांसफार्मर इत्यादि को दुरुस्त करना होगा। इसी प्रकार विद्युत का उपयोग करने के लिए भी हमें उपकरणों बोर्ड, स्विच, तार आदि की आवश्यकता है।
इससे समझ आता है कि मन, सोच और तरंग इत्यादि को बिना किसी माध्यम नियंत्रित करना संभव नहीं। इसलिए ये वह तरंगें हैं जो किसी माध्यम से उत्पन्न होती हैं लेकिन इनकी अपनी कोई छवि या पहचान नहीं परन्तु ये वाहक हैं। मष्तिष्क में उत्पन्न तरंगे ही मन हैं। इन तरंगों की उत्पत्ति मष्तिष्क में होती है। इसलिए मन और मस्तिष्क के संबंध को यदि समझना चाहें तो मष्तिष्क मन का उद्गम स्थल है, अर्थात् "मन का निवास "। चिकित्सा विज्ञान मस्तिष्क अर्थात् मन के निवास का उपचार करती है, मन का नहीं। मन तो मन के घर रूपी मशीनरी द्वारा उत्पन्न सोच, भाव, संवेग, रूपी तरंग है।
मन की एक अन्य परिभाषा के अनुसार विभिन्न नर्व सिस्टम व अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के द्वारा उत्पन्न एक क्रिया चक्र-मन है । वैज्ञानिक आधार पर जब किसी परमाणु को बाह्य ऊर्जा मिल जाती है, तब उसका कोई इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षा से ऊपरी कक्षा अर्थात उच्च उर्जित अवस्था में चला जाता है। यहाँ वह एक सेकण्ड के (10^-8) हिस्से तक ठहरकर वापिस अपनी कक्षा में आ जायेगा।दोनों कक्षाओं की ऊर्जा के अंतर के बराबर ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित कर देगा। यह एक विचारक की कल्पना है।
यदि हम इस परिकल्पना पर विचार करें, तो पायेंगे कि हमारा मष्तिष्क अर्थात मन का निवास सामान्य ऊर्जा अर्थात सोच या मन का निर्माण करती है। जब मनुष्य पर कोई जानलेवा हमला होता है, तब बचाव के लिए "मन का केन्द्र " पर लगने वाला दबाव वाह्य ऊर्जा के रूप में कार्य करते हुए मन के केन्द्र को इतना प्रभावित कर सकता है कि, मन के केन्द्र में उत्पन्न ऊर्जा अपनी उत्तेजित अवस्था के चरम तक जा सकती है।यही ऊर्जा का अंतर प्रकाश के रूप में मष्तिष्क से निकलकर आत्मा का रूप धारण कर शरीर का त्याग कर देता है।
आत्मा की बात करें तो आत्मा प्रत्येक प्राणी में निर्विकार, शुद्ध शक्ति है। आत्मा के 3 स्वरूप माने गये हैं—
जीवात्मा—इसी को संक्षेप में हम सभी आत्मा कहते हैं। यह हर प्राणी के हृदय स्थल में निवास करता है। यह हमारे मन, बुद्धि और इंद्रियों को चैतन्य बनाता है।
महात्मा—यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच की कड़ी है। ये परमात्मा का दर्शन प्राप्त कर चुके होते हैं। इनकी कृपा से जीवात्मा भी परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है।
परमात्मा—इसे आत्मा की आत्मा कहा जाता है क्योंकि यह आत्मा को चैतन्य प्रदान करता है। यह भी हमारे हृदय स्थल क्षेत्र में आत्मा के साथ ही निवास करता है।
आत्मा को एक प्रकार से और समझा जा सकता है। हमारा शरीर एक रथ की तरह है जिसमें हमारी इंद्रियां घोड़े का काम करती हैं। मन लगाम है और हमारी बुद्धि सारथी है। आत्मा यात्री के रूप में उस रथ पर सवार है जिसे परमात्मा की ओर जाना है, लेकिन मोह माया एवं योग माया के प्रभाव से हम संसार की तरफ उन्मुख हैं, इसलिए अनंतानंत जन्मों से कष्ट पाते हैं।
विश्लेषण यही है कि जहाँ मन एक विचारोत्पत्ति है ये विचार अच्छे बुरे कैसे भी हो सकते हैं। ये प्राणी की प्रवृति अनुसार सोच विचार के रूप में उत्पन्न होते हैं इसीलिए कहते हैं कि मन चंचल है। मन में सदाचार - दुराचार, अपनत्व - ईर्ष्या, द्वेष, परोपकार -लोभ लालच, शालीनता - क्रोध, कृतज्ञता - कृतघ्नता आदि विभिन्न विचार उत्पन्न होते हैं जैसे विचार प्रभावी होते हैं वैसा व्यक्तित्व, स्वभाव व आचरण बन जाता है। मनुष्य भौतिक जगत की गतिविधियां मन से संचालित करता है। आत्मा स्वच्छ, निर्मल, निर्विकार, दिव्य, लौकिक शक्ति है जो ईश्वर से मिलन का माध्यम है।
—लीलाधर शर्मा
वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, गुसांईसर चूरू
साभार-khaskhabar.com













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