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नाम बदलने का वक़्त आया : नया शहर, नया जोश, नया गर्व

बृज खंडेलवाल 
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आगरा कभी बादशाहों का दिल था। यमुना किनारे संगमरमर के सपने खड़े हुए, फारसी नक़्क़ाश, राजस्थानी राजमिस्त्री और बुंदेलखंडी लोहार एक ही आसमान में घुल-मिल गए। नाम था अग्रवन, सबसे आगे का जंगल। मगर आज यही नाम जैसे बोझ बन गया हो। सड़कों पर धूल का गुबार, यमुना में गंदगी का सैलाब, और नौजवानों का बैग कंधे पर टिका — बस, शहर की चमक अब सिर्फ़ पोस्टकार्ड में रह गई है। पर असली आगरा तो ताज से कहीं ज़्यादा है। फतेहपुर सीकरी की टेनरियों में हाथ से सिले चमड़े के जूते बनते हैं, जो मिलान की दुकानों तक पहुँचते हैं। लोहे की ढलाई में रेल के पुर्ज़े और खेत के औज़ार गलते हैं, जो आधे हिंदुस्तान को चलाते हैं।  भट्टियों में काँच फूँका जाता है — चूड़ियाँ, झूमर, जो दुबई के मॉल में चमकते हैं। नूनहाई और लोहामंडी की गलियों में ज़री चमकती है, पत्थरों पर पच्चीकारी उकेरी जाती है, और पेठे की मिठास दुनिया को लुभाती है। खेतों में आलू उगते हैं — बारह लाख टन हर साल, कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर आलू-पराठे की जान यहीं है।  
शहर इलाज़ भी करता है और पढ़ाता भी। सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज और आने वाला AIIMS सात राज्यों के मरीज़ों का दर्द बाँटते हैं। 1927 में बने आगरा विश्वविद्यालय ने जज, कवि, कुलपति दिए। मानसिक अस्पताल ने देश में कम्युनिटी साइकियाट्री की नींव रखी। ये शहर कोई संग्रहालय नहीं, ज़िंदा इंजन है — हस्तशिल्प, फसल, दवा और इल्म का। फिर भी साँस फूल रही है। यमुना में ऑक्सीजन नाममात्र को। फैक्ट्रियाँ बंद , व्यापार ठप्प। करघे धूल खा रहे, उनके बच्चे बेंगलुरु में कोड लिख रहे। 
ज़रूरत है एक झटके की — दिलो-दिमाग़ की, इंतज़ाम की, ख़ूबसूरती की। सबसे सस्ता, सबसे ताक़तवर हथियार: नाम बदल दो।   आग्रम— पाँच हरफ, एक धड़कन। संस्कृत में मतलब “सबसे आगे”। पुराना भी, नया भी। स्टार्टअप सा, मंत्र सा। सपना देखो: IIT का लड़का और मोची साथ बैठे, बायो-जूते डिज़ाइन करें। यमुना की मिट्टी से सौर भट्टियाँ चलें, नया काँच उभरे। ड्रोन आलू की रखवाली करें, गंदा पानी साफ़ हो। स्पेशल अस्पतालों की चेन बने, ताज तक स्काईवॉक, पाँच हज़ार करोड़ का मेडिकल टूरिज़्म। विश्वविद्यालय नया रंग ले — हेरिटेज बिज़नेस, सस्टेनेबल डिज़ाइन, दस हज़ार विदेशी बच्चे।  नाम बदला तो गर्व जागेगा। जो कचरा फेंकता था, वो रुकेगा — “मेरा शहर है”। बजट दौड़ेगा: सारा सीवेज साफ़, पचास किलोमीटर साइकिल पथ, फैक्ट्रियाँ बिना धुएँ की।  
इतिहास बोलता है: बंबई से मुंबई, मद्रास से चेन्नई —कलकत्ता से कोलकत्ता, बैंगलोर बंगलुरू, प्रयागराज, नाम बदला, हौसला लौटा। आग्रम भी यही करेगा। रास्ता सीधा: जनता की राय, विधानसभा का क़ाग़ज़, राजपत्र की मुहर। ख़र्च? एक फ्लाईओवर से कम। नतीजा? बेशुमार।  
हर जूता सिलने वाला, काँच फूँकने वाला, डॉक्टर, किसान ज़ुबान पर ले:  हम हैं आग्रम — सृजन, सत्य, तहज़ीब के सरदार!
ताज सुबह प्रेमी बुलाएगा, आग्रम शाम तक थामेगा — छत पर कैफ़े, पुरानी हवेली में गैलरी, सदी पुरानी ढलाई में नई कहानियाँ।  
आगरा गुज़रा वक़्त था। आग्रम आने वाला कल है।  उठो, नया नाम दो, हक़़ लो।  अब वक़्त है, अंधेरे से उजाले की राह पकड़ने का।  हम हैं आग्रम— नई सोच, नई संस्कृति के रहनुमा! और कद्रदान भी।

नारद संवाद

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