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घर और समाज के संघर्षों से जूझते एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कहानी

बचपन में ही मां-पिताजी चल बसे तो एक बहन और दो भाइयों की जिम्मेदारी बिहारी लाल के कंधों पर आ गई। अंग्रेजों का जमाना था और अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ वह कथावाचन और भजनों के माध्यम से जनजागरण में जुटे हुए थे। गुजरात की ओर यात्रा पर निकले तो पहले सूरत जा पहुंचे और फिर द्वारकाधीश तक का सफर पूरा किया। बीसवीं सदी के पहले दशक में, साल 1906 में, वह जन्मे थे, लेकिन अब आगे का जीवन बहन–भाइयों के भरण पोषण के साथ जो खुद के मन ने ठाना था, वह भी पूरा करना था। छोटे भाई देवीराम को काशी पढ़ने के लिए भेजा, बहन का विवाह कर सबसे छोटे भाई की देखभाल में ऐसे जुटे कि कब बचपन छूटा और कब जवान हुए, पता ही न चला। हालांकि, स्वयं विवाह किया लेकिन भाई-बहनों की जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए स्वयं की संतान पैदा न करने का फैसला भी किया। अपने छोटे भाइयों और बहन के रूप में ही वह अपनी संतान का स्वरूप देखते रहे। उम्र के इस पड़ाव पर बिहारी लाल गौतम ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ देश भक्ति में भी लीन होने लगे थे। सूरत के राधे-कृष्ण मंदिर में रहकर, भक्ति मार्ग पर चलते हुए, उन्होंने देश की आजादी के संग्राम में अलख जगाने का निर्णय लिया। गुजरात में महात्मा गांधी की आंधी छाई हुई थी। बिहारी लाल साल 1930 के दांडी मार्च में शामिल हो गए। बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया ओर सूरत से अपने साथियों के साथ गांधीजी के साबरमती आश्रम जा पहुंचे। गांधीजी के साथ पद यात्रा में शामिल हुए। एक तरफ वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रहे थे तो दूसरी ओर वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भी पूर्ण कर रहे थे।साल 1947 में देश आजाद हुआ। आजादी के बाद देश के स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल लोगों को सरकार द्वारा पेंशन और कई तरह के अन्य लाभ दिए जाने का फैसला हुआ तो उन्होंने इस तरह का कोई भी लाभ लेने से इनकार कर दिया। नया आकार ले रहे देश में एक सच्चे देशभक्त की तरह वह फिर से लोगों के बीच भागवत गान के जरिये धार्मिक जनजागरण में जुट गए और शेष जीवन अपने देश, समाज व परिवार के लिए समर्पित कर दिया। पारिवारिक संघर्षों के साथ-साथ सामाजिक कर्तव्यों के सफल निर्वाह करने की सीख 25 सितंबर 1983 को समाप्त हुए बिहारी लाल गौतम के जीवन से ली जा सकती है।

नारद संवाद

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