देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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नई दिल्ली। देश की दो बड़ी पार्टियों की गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव यात्रा के दौरान कडी टक्कर देखी गई। दोनों राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों का जनादेश सोमवार को जनता जनार्दन के सामने आ गया, जिसका पूरा देश बेसब्री से इंतजार कर रही थी। दोनों पार्टियों की बात करें तो चुनावों से पहले प्रचार-प्रसार में दोनों ही पार्टियों ने एड़ी चोटी का जोर लगाकर कोई कसर नहीं छोड़ी। आलम ये था कि पार्टी के दिग्गज नेताओं ने दोनों राज्यों में जमकर रैलियां की और करीब करीब हर मंदिर-मस्जिद अपने हिंदूत्व का प्रमाण पेश किया।यहां तक कि आपको याद होगा कि चुनावी रैलियों के समय एक-दूसरे पर जमकर जुबानी जंग छिड़ी और कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने तो प्रधानमंत्री को नीच तक का संबोधन कर डाला। जानकारों की मानें तो कांग्रेस की हार ये एक बड़ा कारण सिद्ध हुआ। हालांकि इस टिप्पणी के बाद कांग्रेस के आलाकमान ने अय्यर को बयानबाजी के बाद पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा कि गुजरात में जनता ने बीजेपी को अच्छा संदेश दिया है। मोदी जी की विश्वसनीयता और साख के मामले पर सवाल उठ रहा है। मोदी जी की बातें देश नहीं सुनना चाहता है।राहुल ने ये भी कहा कि मोदी जी की मार्केंटिग अच्छी थी लेकिन मोदी मॉडल खोखला था।
जहां तक नतीजे की बात करें तो चुनावी नतीजे आने के बाद यह तो कहना तो उचित होगा की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता जनता के बीच अभी-भी बरकरार बनी हुई है। लेकिन दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली के विधानसभा चुनावों में खाता नहीं खोलने वाली कांग्रेस पार्टी का भी इस बार अच्छा प्रदर्शन बेहद चौंकाने वाला रहा। दोनों प्रान्तों में भाजपा भले ही पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का विपक्ष भी दोनों जगह मजबूत बनकर उभरा है खासकर गुजरात में।यदि इन दोनों चुनावों को जनता की नजर से देखा जाए तो लोकतंत्र ने मोदी पार्टी को जिताया है तो वहीं दूसरी तरफ राहुल पार्टी को मजबूत किया है।
गुजरात में 2012 में हुए विधानसभा चुनावों पर एक नजर डालें तो जहां बीजेपी ने 115 सीटों पर जीत हासिल की थी जिसे अबकी बार सोलह सीटों का खामियाजा भुगतना पडा है और दूसरी तरफ कांग्रेस को पिछले चुनावों में 61 सीटें मिली थी जिसके बाद इस बार सोलह सीटों पर बढ़त बनाई है। इस बदलाव से अंदाजा लगाया जा सकता है की कांग्रेस वापसी की ओर अग्रसर है। देश के 14 राज्यों में सत्ता पर काबिज और चार राज्यों में गठबंधन के साथ अपनी सरकार बनाने वाली पार्टी की अपने ही गढ में हारते-हारते लाज बच पाई है। बीजेपी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने जीत के बाद जो प्रेस कांफ्रेंस की थी उसमें साफ झलक रहा था कि बीजेपी नेताओं चेहरों पर खुशी तो थी लेकिन थोड़ी बनावटी सी। बीजेपी को इस बार सीटें कम मिली है तो उनके पार्टी कार्यकर्ताओं से कहां चूक हुई है इस पर आत्मचिंतन करना बेहद जरूरी है।
जहां चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत तमाम भाजपा नेतागण 150 से ज्यादा सीटें लाने का दावा कर रहे थे लेकिन महज 99 सीटों पर जाकर सिमट गई। जो शायद ये भी दर्शाता है कि गुजरात की जनता ने 28 प्रतिशत जीएसटी काट कर पार्टी को जीएसटी का असली मायना समझाया है। भाजपा की इस जीत को प्रचण्ड जीत तो नहीं कह सकते लेकिन इस जीत से पार्टी के लिए सबक लेना जरूरी है। और विपक्ष में बनकर उभरी कांग्रेस पार्टी के लिए लिए दोनों राज्यों के चुनाव आगामी 2019 में होने वाले चुनावों में कड़ी मेहनत का संदेश देकर गए है। यदि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर राजस्थान, मिजोरम, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनता के बीच पकड़ बना पाई तो अपनी छवि को और बेहतर बना सकती है।
साभार-khaskhabar.com













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