देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। विकास के नाम पर फूहड मजाक हो रहा है। 20 से 25 साल में शहर से गांव तक सडकों को 5 से 10 फुट तक उपर उठा दिया गया है। इससे करोडों का नुकसान लोगों को झेलना पडा है। बावजूद इसके बरसात का पानी घरों और दुकानों में घुस जाता है।
जलभराव की समस्या शहरों, कस्बों ,गांवों में विकराल रूप लेती जा रही है। उसके पीछे का कारण है जल की निकासी ना होना अथवा धीमी गति से होना जनसंख्या वृद्धि के साथ ही लोगों ने विभिन्न पोखरों पर अवैध निर्माण कर लिए है हालांकि यह कार्य प्रशासनिक मिलीभगत से होते रहे है।
अब पोखरों में जाने वाला पानी नाली और नालों में जाने लगा। जबकि पोखर की अपेक्षाकृत उनका आकार छोटा होता है और पानी दूर तक ले जाना पड़ रहा है। इस कारण जलभराव की समस्या बढ़ती जा रही है ।दूसरा बड़ा कारण दुकानों और घरों में बरसाती पानी घुसने का है जो सड़कों को ऊंचा करने के कारण हुआ है कई क्षेत्रों की सड़कें ऐसी हैं जो 20 से 25 साल में 4 से 5 फुट तक ऊंची उठ चुकी है।
पूरे भारतवर्ष में सड़कों को ऊंचा करके बनाने की परंपरा ने जन्म लिया है पुरानी सड़क को उखाड़े बिना ही इस पर नई सड़क ऊंची उठाकर बना दी जाती है इससे गली और बाजारों की नाली- नाले इतने गहरे हो गए हैं कि उनकी सफाई नहीं हो पाती है। और इसी कारण इमारतों की लेवल सड़क से नीचे होने के कारण बरसातों का पानी घरों और दुकानों में घुस जाता है.
जबकि देश की कई हाई कोर्ट इसमे निर्णय दे चुकी है कि कोई भी नई सड़क पुरानी सड़क को उखाड़कर ही बनाई जाए और उस स्थान की इमारतों की औसत ऊंचाई का ध्यान रखा जाए लेकिन इसको नजरअंदाज किया जाता है।
इसमे एक दिलचस्प पहलू यह है कि जिस भी क्षेत्र की सड़क बनती है तो वहां के स्थानीय निवासियों से कभी नहीं पूछा जाता है ना ही कोई विभाग स्थानीय निवासियों के साथ कभी कोई मीटिंग ही करता है स्थानीय निवासियों को ठेकेदार द्वारा कार्य शुरू होने के बाद ही किसी भी निर्माण की जानकारी होती है जबकि प्रत्येक क्षेत्र में 25ः जागरूक और सेवाभावी स्थानीय लोग होते ही हैं फिर भी उनके लिए किए जा रहे निर्माण की बाबत ना उनसे कुछ पूछा जाता है ना उन्हें कुछ बताया जाता है।
सन 2015 में पूरे मथुरा शहर की सड़कें 20 से 30 फीट गहराई तक खोदी गयी थी कई माह लोग परेशान रहे ।कई लोग चोटिल हुए।सड़कें जाम रहती थीं।कई ऐसे सड़के खोदी जाती है जिनकी लाइफ 5 से 10 वर्ष होती है परंतु दो वर्ष बाद ही खोद दी जाती है।और इस सब के बाद भी आज ढाक के तीन पात है।
जन प्रतिनिधि और अधिकारी बदल जाते है।जनता वही रहती है फिर भी उसे किसी निर्माण सम्बन्धी मीटिंग का हिस्सा नही बनाया जाता है।इसी कारण करोड़ो- अरबों खर्च होने के बाद भी समस्या जस की तस रहती है। कभी पानी के लिए, कभी बिजली के लिए ,कभी सीवर के लिए अभी कुकिंग गैस के लिए और सड़कें खोदी जानी बाकी है। भला हो इस मोबाइल फोन का इसने एक सड़क खोदने वाला विभाग कम कर दिया।
लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगाः सुनील शर्मा
समाज सेवी सुनील शर्मा का कहना है कि लोग घर दुकान के कूड़े कचरे को पॉलीथिन में बांधकर नालियों में फेंक देते है।उन्हें नियत स्थान पर ही कूड़ा डालना होगा। बरसातों के पानी को छतों के पाइप द्वारा एक फिल्टर लगाकर बन्द बोरिंगों में छोड़ा जा सकता है।इससे जमीन का पानी रिचार्ज होगा ।और बरसात का पानी नालियों में बेकार होने से बचेगा। शिक्षण संस्थाएं भी बच्चों को इस बारे में जागरूक करें तो काम आसान हो जाएगा।













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