देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreकस्तूरी मृग अपनी नाभि के अंदर की सुगंध को अनभिज्ञ होकर जंगलों में भटकता रहता है पर उसे कभी भी आखरी समय तक पता नहीं लगता की ये सुगंध उसी के अंदर से आ रही है...ऐसे ही मानव रूपी जीव के अंदर भी दैवीय गुण होते हैं पर वो भी उस परमात्मा के अंश आत्मा को कभी नही ढूंढ पाता जो ढूंढ लेता है उसकी जय हो...यही माया का चक्र है जिससे निकलना संभव भी और असंभव भी.... क्योंकि ये तो उस जीव के कर्म के ऊपर है की वो क्या करता है...इसलिए उस मृग के तरह.... मानव शान्ति की तलाश में सब जगह मारा मारा फिरता है जबकि सुख, शांति, सन्तोष उसके अंदर ही रहते है....आगे हरि इच्छा....गौतम













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