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जपनद की पत्रकारिता कई हिस्सों में बटी

कहनी सुननी : इतिहास मिटता नहीं है...वो पीछा करता रहता है...चाहे नेता हो, पत्रकार हो या जो भी हो.....? अभी कुछ दिन पहले में दिल्ली गंगाराम में था...तो मथुरा के मिलने वाले व्यक्ति ने हालचाल पूछा उसके बाद बोले सबके बारे में लिखते हो. कभी पत्रकारों का इतिहास भी लिखों. मेने कहाँ भाई साहब कई बार लिखा है. फिर दोबारा लिख देंगे। सोचा आज दिन अच्छा है. आज ही लिख देता हूँ. जपनद की पत्रकारिता कई हिस्सों में बटी है. अमर उजाला के संस्थापक स्वर्गीय डोरीलाल अग्रवाल का जन्म मथुरा जिले के बल्देव के छोटे से गांव में हुआ था. ये बड़ी बात है. इतने बड़े समूह के संस्थापक कहलाये ये गौरव की बात है ब्रज के लिए. ये बात देश आजादी से पहले की है. बड़ी मेहनत लगन से वो उस मुकाम तक पहुंचे। खेर अच्छे पत्रकार भी जनपद में होते चले आये है. पर पिछले ४० दशक से अबतक बड़े बड़े विचित्र महारथी पत्रकार आये। किसी पे स्कूल की जमीन हड़पने का आरोप लगा। किसी पे बुरी फिल्म बनाने क आरोप लगा। किसी पे यौन शोषण का आरोप लगा शायद बाद में वो झूठा पाया गया ऐसा बताते है सत्य तो ईश्वर ही जाने हुआ क्या था. ऐसे तमाम आरोप लगे कई पत्रकार दिग्गजों पे. कुछ ऐसे भी रहे की हलवाई के यहाँ नौकरी करते करते पत्रकार के लीडर बन गए. कुछ पत्रकारों के लीडर नौकरी में थे उसे करते करते बन गए. वैसे वर्तमान में हालात ज्यादा बुरे है. उद्योग जगत के लोग भी पत्रकार है, समाजसेवी भी पत्रकार है, कबाड़ी वाले भी पत्रकार है, बाइक मिस्त्री भी पत्रकार है, और तो और सफाई कर्मचारी भी पत्रकार बनने की सोच रखते है भाई उनसे पूछा ऐसा क्यों बोले पुलिस हाथ नहीं देती बड़ी हसीं आयी इस बात पे। कैसे कैसे विचित्र लोगों से भरा पड़ा है अपना ब्रज। जीवन में कुछ गलतियां पत्रकारिता करते समय हम पर भी हुई है. एक निरक्षर को हमने भी फोटोग्राफर बनाया बाद में सुना किसी यूनियन के अध्यक्ष ने उसे मान्यता से सुशोभित कर दिया। वैसे वर्तमान हालात में निरक्षरों की बड़ी फौज तैयार हुयी है एक ही समुदाय से. भाई आप किसी भी धर्म या जाति से हो इस पे दिक्कत नही पर पढ़े लिखे तो हो. पर ऐसा नहीं क्योकि रुपयों के लालच में अखबारों के मालिक इनकी योग्यता न देखकर रूपये देखकर अख़बार चलाने के लिए देदेते है. खेर वर्तमान के परिवेश में जनपद की पत्रकारिता सिर्फ एक खोखला ढकोसला रह गयी है. कुछ होनहार लोग अच्छा काम भी कर रहे है. एक विचित्र बात और है वृन्दावन जैसे तीर्थ स्थल पर तो लिफाफा गैंग तक बना हुआ है. ग्रामीण पत्रकार अपने पुराने परिवेश में काम कर रहे है. लिखने को तो बहुत है. पर आज के लिए इतना ही बहुत है. फिर आगे मुलाकात होगी किसी नए लेख के साथ.

 

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