देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreपवन गौतम
हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस कुल में जन्मा था। वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था, जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। इसलिए, अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने वर्षों तक प्रार्थना की। और, आखिरकार उसे वरदान मिला।
लेकिन, इसके बाद हिरण्यकश्यप खुद को ही भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह ही पूजा करने को कहने लगा। इस दुष्ट राजा का प्रहलाद नाम का एक बेटा था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था।
प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की ही पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा न करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया।
उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्रप्त था। उसकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का ही नाम लेता रहा और बच गया, लेकिन होलिका जलकर राख हो गई।
होलिका की यह हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इस तरह, होली का यह त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है।
इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है। लेकिन रंग होली का भाग कैसे बने? इसके पीछे एक अलग कहानी है। यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के समय से शुरू हुई मानी जाती है।
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे, इसलिए होली का त्योहार रंगों के रूप में लोकप्रिय हुआ। वह वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली मनाते थे। वह पूरे गांव में शैतानियां करते थे। आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं दूसरी जगह नहीं मनाई जाती है।
होली बसंत ऋतु का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दियां खत्म हो जाती हैं। कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध बसंत की फसल पकने से भी है। किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में होली मनाते हैं। होली को ‘बसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते
हैं।













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