देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। जयगुरुदेव आश्रम में चल रहे पाँच दिवसीय वार्षिक भण्डारा सत्संग-मेला में पूजन के अवसर पर पंकज महाराज ने महापुरुषों के वचन वाणियों, जीवों का निजघर, व्रत, उपवास के फल, अच्छे समाज के निर्माण, शाकाहार-सदाचार अपनाने, आत्मा-परमात्मा का भेद आदि विषयों पर मार्मिक और प्रेरणादायक सत्संग सुनाया। समाज में लोगों के गिरते चरित्र पर चिन्ता व्यक्त करते हुये कहा कि ऐसी-ऐसी घटनायें घट रही हैं जिससे मालूम होता है कि लोगों में मानवीय विचार खत्म होते जा रहे हैं। बहुत सारे नियम कानून बनाने के बावजूद भी इन घटनाओं में दिनों दिन वृद्धि हो रही है। इससे स्पष्ट है कि नैतिक और चारित्रिक मूल्यों का विकास केवल कानून बनाकर नहीं किया जा सकता है। बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने बहुत पहले आगाह किया था कि यदि लोग अशुद्ध खान-पान का परित्याग नहीं करेंगे तो लोगों का जीवन सुखमय नहीं होगा। मांस, मछली, अण्डा, शराब के सेवन से लोगों में पशुवृत्ति आ जाती है। कुवृत्तियों और बुरे विचारों को बदलने के लिये उन्होंने शाकाहार-सदाचार और मद्यनिषेध के प्रचार-प्रसार में सहयोग देने की अपील करते हुये कहा था कि शाकाहारी के प्रचार से देश दुनियां में वैचारिक क्रान्ति आ
जायेगी। जिसका प्रचार उनके अनुयाई निरन्तर सत्संग कार्यक्रमों के माध्यम से कर रहे
हैं। महापुरुषों के सत्संगों को सुनने और उनके संसर्ग में रहने से चरित्र निर्माण और मानवीय विचारों का विकास होता है इसलिये अपने बच्चों को सत्संग में अवश्य लाया करें। उन्होंने आगे कहा कि यह ‘जयगुरुदेव’ नाम अनामी महाप्रभु का है। यह उस अनामी महाप्रभु का दरबार है। जहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता है। हम लोग भाग्यशाली हैं कि ऐसे अनामी महाप्रभु बाबा जयगुरुदेव जी का सानिध्य मिला। उन्होंने जीवों को अपने सच्चे घर अनामी धाम
पहुंचाने का संकल्प लिया है। ‘‘हम आये वहि देश से जहां तुम्हारो धाम, तुमको घर पहुंचावना एक हमारो काम’’ पंक्ति को उद्धृत करते हुये कहा कि
लोगों को यह विचार करना चाहिये कि हमारे सामने नाते-रिश्तेदार, मां, बाप शरीर को छोड़कर कहां चले जाते हैं। इसके पहले वे कहां थे। हम इस शरीर को छोड़कर कहां जायेंगे। हमारा घर कहां है। जिस प्रकार इस मनुष्य शरीर का कोई न कोई पिता होता है उसी प्रकार इस शरीर में बंद उस जीवात्मा का पिता कौन है? कैसे उसके पास पहुंच सकते हैं आदि विषय की जानकारी महापुरुषों के सत्संग में मिलती है। महापुरुषों का सत्संग सभी मानव जाति के लिये होता
है और सरल होता है। पांच वर्ष के ऊपर का कोई भी बच्चा आसानी से समझ सकता है। अनामी महाप्रभु ने अपनी मौज से अलख, अगम और सतलोक का विस्तार किया। इन तीनों लोकों में उनका रूप है। सतपुरुष भगवान ने ईश्वर, ब्रह्म, पारब्रह्म, महाकाल पुरुष के लोकों का विस्तार किया है। मृत्यु, स्वर्ग और बैकुण्ठ लोकों का विस्तार ईश्वर ने किया है। सभी जीवात्मायें सतलोक से शब्द यानि आवाज के द्वारा नीचे उतारी गई हैं। जब सत्गुरु मिल जाते हैं तो वे जीव को सतलोक पहुंचा देते हैं।













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