देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। घरेलू झगडों में मुकदेबाजी की बजाय आसपी समझबूझ से होने वाले समाधन कहीं बेहतर विकल्प हो सकते हैं। पति पत्नी के बीच के झगडों का असर बच्चों पर भी पडता है। साथ दी दो परिवार इससे प्रभावित होते हैं। ऐसे मामलों में हार जीत ज्यादा मायने नहीं रखती, मुकदमा कोई भी जीते परिवार तो टूटता ही है। बेहतर काउंसलिंग के जरिये ऐसे कई परिवारों को टूटने से बचाया जा सकता है। इसके लिए काउंसलर को भी धैर्य रखना होता है और दोनों पक्षों को पर्याप्त समय और सम्मान देने की आवश्यक्ता होती है। इसके बाद जो परिणाम आते हैं वह ड्यूटी के साथ व्यक्तिगतरूप से भी काफी सुकून देने वाले होते हैं यह कहना है महिला थाने की एसएचओ उपासना सिंह का, उन्होंने महिला थाने का चार्ज सम्हालने के बाद किये गये प्रयासों और इन प्रयासों से मिले बेहतर परिणामों के बारे मंे बताया कि 1 जनवरी 2019 से 31 दिसम्बर 2019 तक कुल 1655 मामले परिवारिक विवाद के महिला थाने आये। इनमें से सभी 1655 मामलों को रजिस्टर किया गया। 693 मामलों में समझौत हो सका, जबकि 1116 मामले निरस्त कर दिये गये। इनमें से 328 मामलों में वाद दायर किये जाने की संस्तुति कर दी गई। जबकि 482 मालले वर्ष 2019 के समाप्त होने तक समाधान की प्रक्रिया में थे। इसके सापेक्ष 1 अक्टूबर 2019 से 31 दिसम्बर 2019 तक यानी तीन महीने के अंदर कुल 387 घरेलू विवाद के मामले महिला थाने आये जिनमें से सभी 387 मामलों को मध्यस्थता के लिए रजिस्टर किया गया। किसी भी मामले को मामलू अथवा बेहद पेचीदगी वाला समझकर छोडा नहीं गया। जिनमें से 111 मामलों में मध्यस्थत कर दोनों पक्षों की बीच समझौता करा दिया गया। जबकि बाकी के 220 मामलों को निरस्त कर दिया गया। इनमें से 89 प्रकरण ऐसे रहे जिनमें वाद दायर करने की संस्तुति की गई है। 33 मामले अभी समझौते की प्रक्रिया में जिनमें प्रयास यही किया जा रहा है कि आपसी समझदारी से समझौता हो जाए।
महिला थाने की एसएचओ उपासना सिंह ने बताया कि किसी भी मामले में काउंसलिंग यानी समझौते की प्रक्रिया शुरू करने से पहले थोडा सा होमवर्क कर लिया जाये तो बेहतर नजीते हासिल किये जा सकते हैं। कई बार पारिवारिक झगडों की वह वजह नहीं होती हैं जिन्हें दोनों पक्ष मान कर चलते है। असल वजह कोई दूसरी होती है, जिसकी चर्चा दोनों पक्ष नहीं करते है। कई बार दोनों पक्षों को भी इसकी जानकारी नहीं होती है, ऐसे में बेतर प्रयास करने बाद भी परिणाम बेहतर लाना मुश्किल हो जाता है। समझौते की प्रक्रिया शुरू करने से पहले दोनों पक्षों की सामाजिक प्रष्ठभूमि, आर्थिक हालात, शैक्षिम स्थिति, असमानता आदि बिंदुओं को समझने के बाद काउंसलिंग ज्यादा सटीक हो पाती है।













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