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बैंक नहीं लेते कटे-फटे और चिंदी लगे नोटों को

मथुरा। बैंक अपने ही अकाउंट होल्डर और उपभोक्ता के कटे फटे अथवा चिंदी लगे नोट को लेने से सा फ इनकार कर देता है। जब बैंक इन नोटों को नहीं ले रहे हैं तो फिर व्यक्ति इनका क्या करेगा। क्या जरा सा कट जाने या चिंदी लग जाने पर कोई व्यक्ति अपने दो हजार के नोट को फैंक देगा।

मथुरा शहर में ही होलीगेट सहित कही जगहों पर कुछ लोग बाकायदा फड लगा कर बैठते हैं और उन नोटों को कम कीमत पर खरीदते हैं जिन्हें बैंक लेने से इनकार कर देता है।

कभी आपने सोचा है कि जिस कटे नोट को बैंक किसी भी कीमत पर लेने को तैयार नहीं उसे कम कीमत पर लेकर ये फडवाले क्या इन नोटों का क्या करते हैं? क्या फटे नोटों से ये लोग नया नोट बना लेते हैं, दूसरा विकल्प यह है कि जिस नोट को बैंक कर्मचारी ने आपसे नहीं लिया वही बैंक कर्मचारी इन कटे फटे नोटों को इन लोगों से ले लेगा।  


सुनील शर्मा का कहना है कि यह बडा खेल है कि 2000 के कटे नोट के अगर बैंक कर्मचारी आपको 200 अथवा 300 रूपये कम में चलाने को कहे तो आप मानेंगे नहीं लेकिन फडवाले को आप इसे 400 रूपये कम में भी दे सकते हैं। यही कमीशन का खेल है जिसके चलते इस तरह के आपके नोट बैंक में नहीं चलते हैं।
जन सहयोग समूह के संयोजक अजय अग्रवाल का कहना है कि इस मुद्दे पर मेरे द्वारा जनसहयोग समूह की ओर से प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और आरबीआई गर्वनर को पत्र भेजा है। 2009 की बैंक नियमावली यह कहती है कि प्रत्येक बैंक शाखा में एक काउंटर होगा जिस पर कटे फटे नोटों को बदला जाएगा।

वहीं हकीकत यह है कि अपने खाताधारक के चेपी लगे नोट को भी बैंक नहीं लेते हंै। अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसा नोट आ जाता है तो वह असमंजस में फंस जाता है। वह उन लोगों के पास पहुंचता है जो इस तरह का काम करते हैं, लेकिन उसे कम कीमत में अपना नोट चलाना पडता है। बैंक की नियमावली के अनुसार सभी बैंक की ब्रांच में इस तरह के काउंटर खोले जाने चाहिए।


व्यापारी नेता सुनील सहानी कहते हैं होलीगेट के नीचे कटे फटे नोटों को बदलने के लिए कुछ लोग बैठे हैं। कम कीमत पर वह आपके इस तरह के नोटों को लेंगे। जबकि बैंक पूरी कीमत पर इन नोटों को इन लोगों के माध्यम से लेगा।

जिसमें दोनों का कमीशन है। छोटे उपभोक्ताओं के साथ बैंक में ठीक व्यवहार नहीं की जाती है। कोई उपभोक्ता जाता है और बैंक में अपना पैसा जमा करता है तो बैंक किसी भी कटे फटे नोट को लेने से साफ मना कर देते हैं। जबकि बडे व्यापारी और उपभोक्ता के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है। बैंक कर्मचारी आम उपभोक्ता के साथ जानबूझ कर रूखा व्यवहार करते हैं जिससे कि वह दलाल के माध्यम से काम कराने को मजबूर हो जाये।

कोरोना संकट में भी नहीं बदली बैंकों की मानसिकता


शिव प्रकाश शर्मा कहते हैं कि कोरोना संकट में भी बैंकों की मानसिकता नहीं बदली है। इस समय कमजोर और मजदूर वर्ग के लिए दस रूपये की भी बडी कीमत है। ऐसे में अगर किसी के पास दो हजार अथवा पांच सौ रूपये का कोई ऐसा नोट आ जाता है और बैंक उसे नहीं लेती है तो यह गरीब व्यक्ति पर बडी मार है। बैंक अलग से काउंटर नहीं खोल सकते हैं तो कम से कम सप्ताह में एक या दो दिन तो इस तरह की व्यवस्था कर ही सकते हैं।
 

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