देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreजरूर पढ़ें : आज की कहानी : मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास एक छोटे से गांव से है.... कैसे एक पिता ने एक समय का भोजन करके बेटे को अफसर बनाया था.....फिर क्या क्या देखना पड़ा...??
व्याखान : एक गांव में एक किसान परिवार जिस पे मात्र कुछ थोड़ा बहुत खेत था...एक बेटा दो बेटियां थी...थोड़ा प्रकाश डालना चाहूंगा....ये क्षेत्र गरीबी रेखा से भी नीचे आते है खेर किसान को अंदर से चाह थी की कम से कम बेटे को तो पढ़ा दो....ताकि कुछ बन सके इसलिए दिन रात एक करके उसे पढ़ाने का काम किया....बताते है एक टाइम भोजन भी बड़ी मुश्किल से होता था....ये वर्ष १९९९ की बात है..खेर धीरे धीरे बेटा भी पढ़ने में तेज निकला बेटे का नाम काल्पनिक देना होगा...संजय गांव से निकल कर अब भोपाल आ चुका था जो की बड़ा शहर था....उसने कुछ ही समय में बाद आईआईटी में जा पहुंचा वहां से एक अच्छे पैकेज पे उसका किसी नामी कम्पनी में सिलेक्शन हो गया....संजय की मंजिल यहां नही रुकी वो आईएएस को भी एक दिन क्रैक कर गया.....यहां से उस परिवार में ताकत मिली खेर वक्त आया....हमारे समाज का जो मधुमक्खी की तरह देखता रहता है.....की कहां शहद है....एक उद्योग जगत से अच्छा रिश्ता आया....जब तक संजय अपने फैसलों में उस पिता को नहीं पूछता था जिसने दिन रात एक करके यहां तक एक टाइम न भोजन करके पाला और पढ़ाया था.....खेर उद्योग जगत की कुबेर पति संजय से मिलकर रिश्ते की आगे बात बढ़ाई....तभी एक दिन पिता के पास आके संजय ने बताया की शादी है.....खेर पिता गांव के सीधे साधे थे उन्होंने कहा तुम जो कर रहे हो बेटा वो ठीक ही करोगे...…खेर शादी होके कुछ साल बाद गुजरात के एक बड़े शहर की कमान संभाली....एक दिन पिता और माता के मन में आया आज तक कभी संजय के जहां जहां उसने काम किया हम गए नही अब तो हमारा छोटा संजय भी आ गया है क्यों न देखने चलते है....और वो बिन बताए उस शहर आ गए जहां संजय था...वो अपने साथ एक लड़का लाए थे गांव का पढ़ा लिखा जिससे आसानी से पहुंच जाए..जिस दिन पहुंचे संजय के बंगले पे उस एक पार्टी थी जिसमे शहर के बड़े लोग और अधिकारीगण मौजूद थे....संजय ने जैसे ही माता पिता को देखा बोला आप लोग अंदर बैठे.....बहु ने भी उन्हें देख लिया था....खेर बहु अंदर गई आप लोग बिना बताए चले आए कम से कम बता के तो आते....वो बेचारे क्या बोल पाते क्योंकि उन पे कोई शब्द नहीं थे गांव का साथ आया लड़का बोला भाभी जी फोन है नहीं गांव में और भाई साहब को काफी चिट्ठी लिखी आजतक उसका कोई जबाव नहीं पहुंचा वो तो गांव एक व्यक्ति जो यहां भाई साहब के पास कर्मचारी है उन्होंने बताया की बेटा हुआ इसलिए देखने चले आए...अचानक उसकी कुछ सहेलियां अंदर आई बोले ये लोग कौन है तो उसने बताया यानी की उनकी बहू ने की ये गांव से काम वाले बुलवाए है....इतना सुनते ही माता पिता मानों टूट गए...खेर वो एक जगह शाम तक बैठे रहे पार्टी चलती रहे जैसे ही संजय फ्री हुआ बोला आप बताके आते में गाड़ी भेज देता....बोले बेटा तुझे देख लिया यही बहुत है.....अब हमें गांव भेज दे यहां से बस संजय समझ नही पाया तो गांव के लड़के ने सब बताया की ये हुआ है....और आपको पढ़ाने के चक्र में गांव की गिरवी रखी जमीन वहां किसी साहूकार ने ले ली थी.....खेर संजय की आंखे नम हुई पर वो बोल नही पा रहा था.... क्योंकि पत्नी का फैसला था जल्दी इन्हे इनके गांव पहुंचाओं...आगे कहानी लंबी है....अब में समाप्त करता हु वो अपने गांव आ गए और दोनों बेटियों की किसी सम्मलेन शादी कर दी और वो हरिद्वार की यात्रा पे निकल गए ये कहानी मेने इलाहाबाद में जब था.....तो यूपीएससी की तैयारी कर रहे एक हम से काफी सीनियर छात्र से सुनी थी ये छात्र और कोई नहीं उसी गांव का लड़का था.....खेर कहानी बहुत है जैसे कल मेने कहा था....पर हमारे समाज की एक कड़वी हकीकत ये है की ये मधुमक्खियां वैसे तो किसी झोपड़ी वाले के यहां नही जायेगी पर उसी झोपड़ी वाले का बेटा कलेक्टर बन जाए फिर ऐसे टूट के पड़ेंगे.....खेर आज की कहानी हमें ये सिखाती है की पढ़ाई के साथ अच्छे संस्कार होना बहुत जरूरी है जो माता पिता देते तो है पर कोई कोई पुत्र ग्रहण नही कर पाता......आज की कहानी में आप को कैसे लगी पढ़े जरूर.....गौतम













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