देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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इलाहाबाद । मैं लड़की हूं तो क्या ?, कमजोर नहीं! मजबूर नहीं।मैं नाजुक हूं तो क्या ? , अधीर नहीं! हताश नहीं।।
तोड़ रही हूं बेडियां तो क्या? दस्तूर नहीं, मंजूर नहीं!
मैं ईश्वर की रचना तो क्यों ,अभिमान नहीं ! सम्मान नहीं ।
मैं नित नये कीर्तिमान रचू तो क्या ? मेहनत नहीं ! विश्वास नहीं
मैं फक्र तुम्हारे तन-मन का तो क्यों, गौरव नहीं! गुमान नहीं। मैं बेटी हूं, बहन हूं, पत्नी, मां और प्रेमिका भी, तो क्यों , शक्ति नहीं, शक्ति का केन्द्र नहीं ।
मैं जीवनदायिनी जननी हूं तो क्यों, प्रेरणा नहीं ! प्रमाण नहीं ।
मैं नारी धर्म की ध्वजवाहक तो क्या, बलिदान नहीं ! दान नहीं !
हर घर की गूंजती किलकारी हूं न समझो तो क्या, सौम्य नहीं ! सौम्या नहीं।।
ये चंद लाइने उस साधरण लड़की के लिये थे जिसने अपनी लगन से खुद को व्यक्ति से व्यक्तित्व तक के सफर का जीता जागता उदाहरण पेश किया । जी हां हम बात कर रहे हैं सौम्या पाण्डेय की। इलाहाबाद की इस बेटी ने भारत की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा की 2016 परीक्षा में ऐसा झंडा गाड़ा है, कि आने वाले कयी सालो तक सौम्या लोगो के लिये प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। सौम्या ने दोअर्थी बातें करने वाले लोगों और बेटियों को भ्रूण में दफन करने वाले समाज को वह नारी शक्ति का वह आइना दिखाया है, जो दशकों य सदी के लंबे अंतराल पर, परन्तु समय समय पर नारी ध्वजवाहक हमेशा से दिखाती चली आई हैं। सौम्या पाण्डेय ने न सिर्फ अपना बल्कि अपने माता पिता व इलाहाबाद का नाम पूरे देश में रोशन किया है। ऐसे तो बिरले ही होते हैं जो अपने पहले ही प्रयास में आईएएस की परीक्षा क्वालीफाई करे। लेकिन सौम्या ने न सिर्फ पहली बार में परीक्षा पास की। बल्कि ऑल इंडिया चौथी रैंक हासिल करने असंभव को संभव कर दिखाया है। सबसे अहम बात है कि सौम्या अभी महज 23 साल की हैं। बामुश्किल उन्होंने आठ महीने पहले आईएएस की तैयारी शुरू की थी और अपने पहले ही प्रयास में इतिहास रच दिया।
जब इंडिया लेवल पर छा गयी थी सौम्या
सौम्या के लिये ऑल इंडिया लेवल पर सफलता दर्ज करने की यह पहली घटना नहीं थी। इससे पहले वह पढाई के दौरान भी यह कारनामा कर चुकी है। सौम्या ने हाईस्कूल व इंटर में न सिर्फ अपना जिला टाॅप किया था। बल्कि ऑल इंडिया तीसरी रैंक हासिल की थी । सौम्या ने आर्मी पब्लिक स्कूल न्यू कैंट इलाहाबाद से 2009 में 10वीं की परीक्षा 94 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की, जबकि 12वीं की परीक्षा 2011 में इलाहाबाद पब्लिक स्कूल चौफटका से 97.4 फीसदी अंकों के साथ पास की थी।
गोल्ड मेडल ने बता दिया था वह है खास
देश के प्रतिष्ठित कालेज में सुमार इलाहाबाद का मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी कालेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कर रही सौम्या ने जब 2015 में गोल्ड मेडल पाने का कारनामा किया तभी स्पष्ट हो गया था कि सौम्या बहुत खास है और आखिरकार जब सौम्या ने आईएएस बनने का ख्वाब देखा तो बड़ी सिद्दत से सफलता को चूम लिया । आज पूरा देश सौम्या की उपलब्धि पर इतरा रहा है। महज 23 साल की उम्र में बेटी सौम्या को इतनी बड़ी सफलता मिलने पर पिता डॉ. रवि पांडेय और मां डॉ. साधना पांडेय खुशी से फूले नहीं समा रहे।
सौम्या की जुबानी उनकी कहानी
सौम्या ने एमएनएनआईटी से बीटेक किया और अचानक से आईएएस बनने की मंशा पिता डॉ. रवि पाण्डेय और मां डॉ. साधना पाण्डेय से बतायी । बेटी के इंजीनियर के बजाय अचानक से आईएएस बनने को लेकर माता पिता थोड़ा अचरज में थे। क्योंकि गोल्ड मिलने के बाद सौम्या का तो सुनहरा भविष्य लगभग तय हो चुका था। उसे न सिर्फ मनचाहा पैकेज मिलता । बल्कि वह अपने पसंद की जगह काम भी करती। लेकिन सौम्या के मन में समाज के लिये भी कुछ करने का ख्वाब पल रहा था। सौम्या को एक आईएएस के तौर पर वह सब नजर आया। जिससे वह नाम पैसा, रूतबा और समाजसेवा सबकुछ कर सकती थी। बस फिर क्या था । सौम्या के निर्णय को घरवालों ने पूरा सपोर्ट किया और जी जान से सौम्या तैयारी में जुट गई और अब वह हर किसी के लिये प्रेरणास्रोत बन गई है ।
जब बढाया कदम
बीटेक का रिजल्ट अगस्त 2015 में आ चौका था। संस्थान ने सौम्या को गोल्ड मेडल दिया लेकिन अपनी सोच के अनुरूप सौम्या नेआईएएस बनने के लिये सिविल परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। फार्म भरने के बाद पूरी लगन से सौम्या आईएएस 2016 की परीक्षा को क्रैक करने का प्रण कर चुकी थी। वह किसी विशेष परिस्थिति को छोड़कर रोज सात-आठ घंटे पढती और यह क्रम परीक्षा की तिथि तक जारी रहा। लगभग 8 महीने की कड़ी तपस्या के बाद सौम्या ने परीक्षा दी और रिजल्ट आपके सामने है।
दरअसल इंजीनियरिंग की छात्रा होने के बावजूद भी सौम्या ने भूगोल विषय को वैकल्पिक विषय के तौर पर चुना । यह कही से भी सौम्या के लिये आसान नहीं था। लेकिन इस सफर पर बढने के बाद सौम्या का मानना था कि एक आईएएस को इस विषय की जानकारी जरूर होनी चाहिए। सौम्या ने निर्णय लिया कि वह घर पर ही रहकर तैयारी करेंगी। लगभग सारी तैयारी सौम्या खुद ही करती रही। पर बाद में उन्होंने जीएस के लिए मैंने ध्येय आईएएस से कोचिंग शुरू की। उनका यह निर्णय सही रहा। क्योंकि कोचिंग के गाइडेंस से सौम्या का आत्मविश्वास लगातार बढता गया।
रणनीति का हिस्सा
सौम्या ने सबसे महत्वपूर्ण विषय सामान्य अध्ययन की तैयारी के लिये खास रणनीति बनायी। कोचिंग के अलावा रोज सुबह दो घंटे अखबार पढ़कर व टीवी पर न्यूज चैनल देखकर वह तैयारी करने लगी। करेंट अफेयर्स पर सीधा फोकस कर रही थी।
चूंकि सौम्या ने शुरू से अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की थी, इसलिए पूरी परीक्षा अंग्रेजी में देने का निर्णय लिया।
सौम्या अब तक की तैयारी में यह समझ चुकी थी कि सिविल सेवा की परीक्षा में अब जिस तरह के पेपर बन रहे हैं उसमें अधिकतर एप्लीकेशन बेस्ड यानी अनुप्रयोग पर आधारित प्रश्न आ रहे हैं। आयोग का ध्येय साफ था वह अभ्यर्थी की ओपिनियन जानने की कोशिश करता है। यही बेहतर चयन का सबसे अच्छा मापदंड भी होता है। यह ऐसी तैयारी होती है जिसे कोई कोचिंग चाह कर भी नहीं करा पायेगा। इसलिए सौम्या पूरी तैयारी खुद करती बस एक स्तंभ के रूप में कोचिंग की भूमिका का उपयोग कर रही थी।
25 मिनट 9 सवाल
मेन्स परीक्षा पास कर जब इंटरव्यू में सौम्या पहुंची तो इनके सामने सवालो की बौछार हुई । 25 मिनट में 9 सवाल पूछे गये। लेकिनऑ वह तनिक भी परेशान नहीं हुई। वजह साफ थी। सौम्या से वही पूछा जा रहा था। जो उसने पढा था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के सवालो को इस गोल्ड मेडलिस्ट ने धड़ाधड़ जवाब दिये और जब बात आई करेंट अफेयर्स की तो सौम्या को मानो यह और भी आसान लगा। पीके जोशी के बोर्ड में इंटरव्यू दे रही सौम्या ने चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर से लेकर विदेश नीति तक पर अपने जवाब दिये। सौम्या कहती है कि उनकी मां की प्रेरणा और पिता का भरोसा उन्हे यहां तक ले आया है। हर बेटी को वह सशक्त बनते देखना चाहती हैं।
साभार-khaskhabar.com













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