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नक्सलियों के गढ़ में लोकतंत्र की आवाज बुलंद कर रही 21 साल की महिला सरपंच

"जब टूटने लगे हौसला तो बस ये याद रखना बिना मेहनत के हासिल तख्त-ओ-ताज नहीं होते, ढूंढ लेना अंधेरों में मंजिल अपनी क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते"

इन पंक्तियों से मिलती-जुलती ऐसी ही एक प्रेरणादायी कहानी से आपको रूबरू कराएंगे। अक्सर लोग पढ़-लिखकर नौकरी करने के लिए गांव छोड़कर चले जाते हैं। अगर सभी लोग ऐसा करने लगे तो फिर गांव के विकास की ओर ध्यान कौन देगा? ये विचार हैं भाग्यश्री मनोहर लेकामी के। जी हां, उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद गांव वापस आकर गांव का विकास करने का फैसला किया। 21 वर्षीय भाग्यश्री मनोहर लेकामी गांव की सरपंच हैं और इस समय वह दिन-रात अपने गांव के विकास के काम में जुटी रहती हैं। महज इतना ही नहीं यह 21 वर्षीय महिला सरपंच नक्सलियों के गढ़ में लोकतंत्र की आवाज को बुलंद करने का महत्वपूर्ण काम भी कर रही हैं। भाग्यश्री अपनी बाइक पर घूमती हैं और लोगों से सीधे संवाद करती हैं, वो भी बिना डरे और बिना किसी खौफ के। आइए अब विस्तार से जानते हैं कि आखिर यह 21 साल की महिला सरपंच किस तरह से अपने गांव का विकास कर रही है...

21 साल की महिला सरपंच भाग्यश्री लेकामी

भाग्यश्री लेकामी महाराष्ट्र के भामरागढ़ तहसील में मौजूद कोटी ग्राम पंचायत की सरपंच हैं। कोटी गांव महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसा है। लाल आतंक के गढ़ अबजुमार की घनी पहाड़ियों से एक दम करीब महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर नौ गांव की कोटी ग्राम पंचायत में बीते कई सालों तक कभी सरपंच निर्वाचित नहीं हुआ। नक्सलियों के डर से न तो लोग चुनाव में नामांकन भरते और न ही मतदान करते, लेकिन 2019 में इन गांवों ने लोकतंत्र की पहली सीढ़ी चढ़ते हुए अपने गांव में सरपंच का चयन किया, जिसके लिए गांव की पढ़ी-लिखी उच्च शिक्षित 21 साल की भाग्यश्री लेकामी को चुना गया। 

समस्याओं से जकड़े गांव को बाहर निकालने के लिए किया त्याग

आम बच्चों की तरह भाग्यश्री भी शहर जाकर करियर बनाना चाहती थी, लेकिन समस्याओं से जकड़े गांव को बाहर निकालने के लिए उन्होंने गांव में रहकर ही काम करने का निर्णय लिया। अब तक भाग्यश्री अपने कार्यकाल के दो साल पूरे कर चुकी हैं और इस वक्त में भाग्यश्री ने अपने गांव की तस्वीर बदलने की पुरजोर कोशिश की है। सीमेंट की छोटी और पक्की सड़कें हों या फिर पानी की समस्या, वे अपना पूरा समय गांव के विकास में लगाती हैं। रोजगार का अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, ये गांव की सबसे बड़ी समस्या है, जिसे सुलझाने के लिए भाग्यश्री दिन-रात मेहनत कर रही हैं। इसी बीच महिलाओं के स्वास्थ्य और माहवारी से संबंधित बीमारियों के लिए काम करना भाग्यश्री ने अपने एजेंडे में अहम स्थान पर रखा है। उन्होंने महिलाओं के लिए सेनेटरी पेड की उपलब्धता को सुनिश्चित किया है। 

भाग्यश्री के ग्राम पंचायत में कुल 9 गांव

भाग्यश्री के ग्राम पंचायत में कुल 9 गांव हैं। एक गांव से दूसरे गांव की दूरी तय करने के लिए जंगलों की कच्ची सड़कों से होकर गुजरना पड़ता है। गांव में जाकर लोगों से सीधे जुड़ने के लिए भाग्यश्री बाइक पर सवार होकर घंटों घूमती हैं। कई गांव में जाने के लिए नदियों के बीच से चलकर और ज्यादा पानी होने पर नाव में सवार होकर जाना पड़ता है। यह पूरा इलाका नक्सल समस्या से ग्रस्त है। पिछले कई सालों में इन इलाकों में आईईडी विस्फोट, पुलिस पर जानलेवा हमलों जैसी कई खतरनाक वारदातें हो चुकी हैं और ऐसे में हरदम हर कदम पर खतरा बना रहता है। बावजूद इसके भाग्यश्री निडर होकर अकेली गांव में घूमती हैं और लोगों से संवाद करती हैं। अपने पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती और बिना किसी भय के अपने गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ती भाग्यश्री लेकामी अनेक लोगों के लिए प्रेरणा की स्रोत हैं।

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