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मथुरा। कृषि वैज्ञानिक की टीम ने मथुरा में डेरा डाल दिया है। जनपद में करीब 50 हजार हैक्टेयर धान की फसल का औसत रकवा है, इस बार अधिक बरसात के चलते कुछ क्षेत्र्ाों में शुरूआत में ही फसल खराब हो गई। इस वर्ष करीब 47 हजार हैक्टेयर में धान की फसल है। किसानों उत्साह में अधिक अधिक नत्र्ाजन डाला। कृषि वैज्ञानिकों ने खेतों का परीक्षण कर तीन फसल के नष्ट होने के तीन प्रमुख कारणों में इसे भी एक कारण माना है। दूसरा कारण औसत से अधिक बरसात को वैज्ञानिकों ने माना है।
ये टीम कर रही आंकलन
वरिष्ठ शोध अधिकारी डा. एन पी मल्ल की अध्यक्षता में गठित समिति के सदस्य प्रमुख वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केन्द्र मथुरा डा. एस के मिश्रा, उप कृषि निदेशक (संाख्यिकी) कृषि निदेशालय उमा शंकर सिंह, कृषि रक्षा आगरा मण्डल उप निदेशक डा विपिन विहारी द्विवेदी एवं चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्व विद्यालय कानपुर कीट विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक डा यशपाल मलिक, पादप रोग विज्ञान विभाग वैज्ञानिक डा एस के विश्वास के साथ-साथ संयुक्त कृषि निदेशक टी पी चैधरी, उप कृषि निदेशक मथुरा धुरेन्द्र कुमार एवं जिला कृषि रक्षा अधिकारी विभाति चतुर्वेदी शामिल हैं।
निरीक्षण में यह निकला निष्कर्ष
चैमुहां, नन्दगांव एवं छाता के ग्रामों में धान एवं कपास की फसलों का
निरीक्षण किया गया। निरीक्षण में पाया गया है कि धान की फसल जो वानस्पतिक अवस्था में है तथा बालियां निकल रही हैं इसमें तना वेधक का छिटपुट प्रकोप पाया गया। जिन फसलों में बालियां निकल चुकीं है तथा पकने की अवस्था में है। उसमें तना वेधक कीट का तीव्र प्रकोप पाया गया है। उप कृषि निदेशक ने बताया कि धान की फसल जो अभी वानस्पतिक अवस्था में हैं या बालियां निकल रही हैं।
वैज्ञानिकों ने ये बताया समाधान
इन खेतों में क्यूनालफाॅस 25 प्रति ई.सी. 600 मिली, क्लोरोपाईरीफाॅस 20 प्रति ई.सी. 600 मिली, ट्राईजोफाॅस 40 प्रति ई.सी. 500 मिली, मोनोक्रोटोफाॅस 36 प्रति एस.एल की 500 मिली मात्रा प्रति एकड़ लगभग 200 से 250 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें। जिन खेतों में बालियां निकल चुकीं है तथा पकने की अवस्था में हैं, उसमें मैलाथियाॅन 5 प्रति धूल अथवा फेनवेलटर 0.4 प्रति धूल की 10 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ बुरकाव करें।
कपास पर भी प्रकोप
कपास की फसल में छूटपुट न्यून स्तर पर कपास के लाल कीट का प्रकोप पाया गया। इस कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रति एसएल की 100 मि0ली. अथवा मोनोक्रोटोफाॅस 36 प्रति एसएल की 500 एमएल मात्रा को प्रति एकड़ लगभग 300 लीटर पानी में घोलकर आवश्कतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करें।













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