देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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मथुरा(सुनील शर्मा)। भाद्रपद अष्टमी की मध्यरात्रि को मथुरा में कंस के कारागार में जन्मे देवकीनंदन सुबह गोकुल में नंदनंदन हो गये। कान्हा के जन्म की खुशी गोकुल में मनार्इं गइंं। पैदा तो मधु पुरी में हुए श्याम जी मुरार,
गोकुल में आके नन्द के घर में लिया करार।
नन्द उनको देख होवे था जी जान से निसार
माई जशोदा पीती थी पानी को बार बार॥
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि को कान्हा के जन्म का साक्षी बनने के बाद श्रद्धालुओं का रैला कान्हा के गांव गोकुल की ओर बढ़ चला था। श्रद्धालु सुबह कान्हा के जन्मोत्सव का साक्षी बनने के लिए उतावले थे। कान्हा के जन्मोत्सव को नंदोत्सव के रूप में ब्रज में मनाया जाता है। ब्रज के सभी मठ मंदिरो में नंदोत्सव की धम रहती है लेकिन कान्हा के गांव गोकुल के नंदभावन के नंदोत्सव की की बात ही अनूठी है। यहां भगवान श्रीकृष्ण डोले में विराजमान होकर नंद चौक पर पहुंचते हैं। जहां श्रद्धालुओं पर नंदबाबा उपहारों की बरसात करते हैं। बालकृष्ण की छवि को निहारने के लिए श्रद्धालुओं की अधीरता देखते ही बनती है। नंदोत्सव के लिए कान्हा के गांव को विशेष रूप से सजाया संवारा जाता है। सभी प्रवेश द्वारों के साथ ही नंद चौक और नंदभवन की छटा निखर उठती है।
श्रद्धालुओं के मुख से बरबस ही शब्द फूट पड़ते हैं...
गोकुल की गलियां भलीं, कृष्ण चरणों की थाप,
अपने माथे पर लगा, धन्य भाग भईं आप।
ब्रज की रज चंदन बनी, माटी बनी अबीर,
कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।













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