देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। रमणरेती स्थित उदासीन श्रीकाष्र्णि आश्रम में गुरू परंपरा के सम्मान में आयाजित 87वें गुरू काष्र्णि गोपाल जयंती महोत्सव में शनिवार को योग गुरू बाबा रामदेव ने कहा कि आज शास्त्रों की युगानुरूप व्याख्या करने की सबसे बड़ी आवश्यकता है । ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः’ तथा विश्व बिन्धुत्व को आदर्श मानने वाले सनातन धर्म में पहले से सामाजिक समरसता के बीज मौजूद हैं।
शनिवार रमणरेती धाम में आयोजित गुरु काष्णर््िा गोपाल जयन्ती महोत्सव के मंच से योगगुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि जब पंचतत्व, पंच ज्ञानेन्द्रियों एवं पंच कर्मेन्द्रियों के आधार पर हमारे यहाँ सहज प्रेम एवं एकत्व को संस्कृति ही स्वीकार्य है तो मात्र जन्म के आधार पर जातीय भेदभाव को किसी भी प्रकार उचित नहीं ठहराया जा सकता । हम सब एक ही ईश्वर की सन्तान हैं । उसी के ऐश्वर्य के विस्तार के रूप में यह संसार है । जातीय भेदभाव की ऊँची दीवारें हमें बांटती हैं, अतः उन्हें गिराकर पुनः सामाजिक समरसता पैदा करना जरूरी है । सत्र की अध्यक्षता कर रहे जूनागढ़ पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द जी गिरि महाराज ने कहा कि मात्र जन्म से ही सभी सिद्धियाँ, विशेषताएँ प्राप्त नहीं होतीं । उन्हें तो अपने जप, तप, संयम, नियम, अभ्यास तथा कठोर परिश्रम द्वारा प्राप्त किया जाता है, जिसे हर मनुष्य प्राप्त कर सकता है । उन्होंने कहा कि जातीय द्वेष के कारण जिन्ना तथा अम्बेडकर को तत्कालीन पुरोहितों ने नहीं अपनाया जिसके कारण देश बंटा तथा अम्बेडकर को बौद्ध धर्म अपनाना पड़ा । उन्होंने कहा कि आज इन ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का वक्त है, जातीय भेदभाव को मिटाकर पूरे भारत को पुनः एकता के सूत्र में बांधने और देश को मजबूत बनाने का वक्त है ।
उन्होंने कहा कि काष्णर््िा पीठाधीश्वर महामण्डलेश्वर स्वामी गुरु शरणानन्द जी महाराज की सभी मतमतान्तरों के प्रति आदर भावना के कारण गोपाल जयन्ती उत्सव भारत के भाग्योदय, राष्ट्रोत्थान एवं राष्ट्रीय चेतना का उत्सव बन गया ।
समारोह का मंच संचालन कर रहे गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने कहा कि जातियाँ यदि राष्ट्र की कमजोरी बन जायें तो हमें बहुत सजग रहने की आवश्यकता है । उन्होंने कहा कि परिवार एवं समाज का विघटन रोकने की योजना आज सन्तों से ही निकलेगी तथा इसके लिए रमणरेती धाम को सदैव सम्मान के साथ याद किया जायेगा ।
मन्दिर-मठ-आश्रम निभायें नई पीढ़ी को समाज देने की जिम्मेदारी: गोविन्द देव गिरिजी
नई पीढ़ी को उत्तम संस्कार दिये जाने की आज सर्वाधिक आवश्यकता है। स्कूली शिक्षा उन्हें जीविका दे सकती है पर संस्कार नहीं दे सकती। काष्र्णि गुरु गोपाल जयन्ती के मंच से उक्त विचार व्यक्त करते हुए स्वामी गोविन्दानन्दजी गिरि महाराज ने कहा कि बच्चों को संस्कार देने का दायित्व मठ, मन्दिरों, आश्रमों एवं संतों को निभाना चाहिये। आश्रम में आज हुए 80 ब्रह्मचारियों के उपनयन संस्कार के बाद आशीर्वाद के क्रम में उन्होंने कहा कि संस्कारों से चारित्रिक दृढ़ता आती है तथा सामाजिक समरसता की प्रेरणा मिलती है।
गुजरात के स्वामी परमानन्दजी महाराज ने कहा कि हम मन की इच्छाओं की अपेक्षा शास्त्र सम्मत विशेषताओं को प्रधानता देना सीख जायें तो हमारे संस्कार स्वतरू उत्तम हो जायेंगे। इससे बुद्धि ठीक होगी, हमारे निर्णय ठीक होंगे तथा जीवन सही दिशा में आगे बढ़ेगा। गायत्री की उपासना करने से भी बुद्धि की निर्मलता एवं प्रखरता प्राप्त होती है। मलूक पीठाधीश्वर स्वामी राजेन्द्र दासजी महाराज ने कहा कि ईश्वर की शरणागति के बिना सामाजिक समरसता नहीं आ सकती। वर्णाश्रम व्यवस्था को विश्व की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बताते हुए कहा कि इससे संसार की तमाम सामाजिक समस्याओं का समाधान सम्भव है। उन्होंने इसके लिए यक्ष युधिष्ठिर संवाद से उद्धरण भी दिए













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