देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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वृन्दावन। वात्सल्य ग्राम में चल रही श्रीमद भागवत कथा में चैथे दिन साध्वी ऋतम्भरा ने दशावतार की कथा का वर्णन करते हुए गज-ग्रह मुक्ति का मार्मिक प्रसंग सुनाया उन्होंने कहा सन्त महात्मा यदि किसी को श्राप भी देते है तो वह भी कल्याणकारी आषीर्वाद बन जाता है क्यों कि श्रापित ग्रह के उद्धार के लिए नारायण को स्वयं आना पड़ा और उसे पूर्व जन्म के श्राप से मुक्त कर बैकुण्ठधाम भेजा। जो अपने को समर्पित हो सके स्वयं को जान सके वह धन्य होता है। हमें जो मिला है उसी का सदुपयोग करना चाहिए जब व्यक्ति के अन्दर सुख प्राप्त करने के स्थान पर सुख देने का भाव जागृत हो जाता है
उन्होंने कहा कि हम अपनी इन्द्रियों को समर्पित हो जाते हैं अपनी महत्वाकांक्षाओं को अर्पित हो जाते हैं। पता ही नहीं चलता अपने अस्तित्व की तलाश में जीवन बीत जाता है पर अपने मूल का पता नहीं चलता किन्तु जो सदगुरू को अपना हाथ थमा देते हैं। उनके जीवन में धन्यता का बोध हो जाता है। बाहर के रवि को देखकर मुग्ध होना ठीक नहीं अपने अन्तर के प्रकाश को भी झाॅंकना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पदों से व्यक्ति महान नहीं बनता व्यक्ति अपने गणों से महान बनता है। कुछ लोग पद का दुरपयोग करते हैं तो कुछ लोंगों से पद् की षोभा होती है।
इस अवसर पर संजय भईया, स्वामी अभयानन्द, राम जी भाई पटेल, ब्रहमरतन अग्रवाल,साध्वी षिरोमणि, विभोर प्रकाषम,साध्वी सत्य प्रिया, स्वामी सत्यषील, पंडित विनोद कुमार गौड़, दिनेश कुमार गौरीशंकर, श्याम सुन्दर एवं समस्त चाडक्य परिवार उपस्थित रहा।













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