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रेलमंत्री की एम्बुलेंस को भी कबाड़ बना रहा है पीजीआई

रेलमंत्री की एम्बुलेंस को भी कबाड़ बना रहा है पीजीआईरोहतक । प्रदेश का सबसे बडा़ मेडीकल संस्थान होने और हर तरह से सक्षम होने के बावजूद यहां के डाक्टरों और अधिकारियों की मनमानी मरीजों पर भारी पड़ रही है। यहां पर सरकारी एम्बुलेंस हैं, लेकिन किसके लिए हैं, इसका कोई पता नहीं। मरीजों को निजी एम्बुलेंस के सहारे ही रैफर किया जाता है। पीजीआई से कुछ दूरी पर निजी एम्बुलेंस की पार्किंग है, मरीज के गंभीर होने और मृत्यु होने पर परिजन यहीं से एम्बुलेंस लेकर जाते हैं।

 

आपको बता दें कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने तीन महीने पहले 4 अप्रैल को सांसद निधि से प्रदेश को 17 एडवांस लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस भेंट की थीं, ताकि आपात स्थिति में मरीजों को रैफर किया जा सके। रोहतक पीजीआई को भी सांसद ने ऐसी ही तीन एम्बुलेंस दी थी, लेकिन ये एम्बुलेंस जब से मिली हैं, तब से पीजीआई की वर्कशाप में खडी़ हैं। हालांकि पीजीआई प्रबंधन का दावा है कि मांग के हिसाब से एम्बुलेंस भेजी जाती हैं, लेकिन हकीकत ये है कि आमतौर पर पीजीआई से मरीजों को एम्बुलैंस नहीं मिलती।

 

पीजीआई से अगर किसी मरीज को दिल्ली, गुरूग्राम या चंडीगढ रैफर करना पडे़ तो मरीज को शायद ही कभी एम्बुलेंस मिलती हो, क्योंकि अधिकारियों की सिफारिश के बिना एम्बुलेंस मिलती ही नहीं। मरीज के रिश्तेदार परेशान होकर या तो सिविल सर्जन कार्यालय से एम्बुलेंस मांगते हैं या फिर निजी एम्बुलेंस संचालकों के पास जाते हैं। 

 

पूर्व सीएम मास्टर हुकुम सिंह को भी यहां से समय पर एम्बुलेंस नहीं मिली थी, बाद में उनकी मौत हो गई थी। इस घटना के बाद भी पीजीआई प्रशासन ने अपने सिस्टम में सुधार नहीं किया और रेलमंत्री ने जो एम्बुलैंस दी थी, उनको भी वर्कशाप में लगा दिया।

 

इस बारे में जब पीजीआई के ट्रांसपोर्ट अधिकारी सुरेश कुमार से बात की तो उन्होंने कहा कि जब डिमांड आती है तो एम्बुलेंस मुहैया करा देते हैं, लेकिन डिमांड कहां से आती है तो उनका जवाब सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे। संस्थान के 6-7 उच्च अधिकारी हैं, उनकी डिमांड पर ही एम्बुलैंस दी जाती है। अब इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आपात स्थिति में मरीज को अगर रैफर किया जाता है तो संबंधित डाक्टर के पास एम्बुलेंस देने की पावर तक नहीं है। डाक्टर या मरीज को उच्च अधिकारियों से सम्पर्क करना पडेगा, कई बार तो सम्पर्क ही नहीं हो पाता और अगर सम्पर्क हो भी जाता है तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि एम्बुलेंस मिल जाएगी। आखिरकार थक-हारकर मरीज के परिजनों को निजी एम्बुलेंस की व्यवस्था करनी पडती है।

 

निजी एम्बुलेंस संचालकों का कहना है कि पीजीआई के पास खुद की एम्बुलेंस हैं, लेकिन वे प्रयोग नहीं की जाती। ज्यादातर मरीजों को हम ही लेकर जाते हैं। अगर कोई सीरियस मरीज है तो उसको इमरजेंसी के बाहर से लेने के लिए जाते हैं तो पीजीआई के सुरक्षा गार्ड बदतमीजी भी करते हैं। एक तो पीजीआई मरीजों को एम्बुलेंस नहीं देता और वे लोग एम्बुलेंस देते हैं तो उनके साथ भी बदतमीजी होती है। मरीजों के परिजन भी पीजीआई की इस व्यवस्था से काफी नाराज हैं, उनका कहना है कि पूर्व सीएम को ही इन लोगों ने एम्बुलैंस नहीं दी तो आम मरीज की तो औकात ही क्या है। यहां एम्बुलेंस तो दूर दवाई भी नहीं मिलती।

 

पीजीआई के मरीजों को निजी एम्बुलेंस के अलावा सिर्फ एक ही सहारा है और वो है सिविल सर्जन कार्यालय की एम्बुलेंस। आपात स्थिति में पीजीआई के मरीजों को भी सिविल सर्जन कार्यालय की तरफ से एम्बुलेंस मुहैया कराई जाती है। हालांकि सिविल सर्जन कार्यालय में भी आधे से ज्यादा एम्बुलेंस कबाड़ बन चुकी हैं। 

 

डिप्टी सीएमओ डा. कुलदीप सिंह ने कहा कि उनके पास एम्बुलैंस कम हैं, इसके बावजूद वे पीजीआई को एम्बुलेंस मुहैया कराते हैं। अगर पीजीआई अपनी एम्बुलेंस उनको दे दे तो वे उनको बेहतर ढंग से ऑॅपरेट करेंगे और उनको पीजीआई में ही खडी करेंगे। रेलमंत्री ने जो एम्बुलेंस दी थी, वे काफी कीमती हैं और उनके अन्दर पूरा लाईफ सपोर्ट सिस्टम मौजूद है।

साभार-khaskhabar.com

 

 

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