देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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गोवर्धन। गोवर्धन का मुड़िया पूर्णिमा मेला धीरे.धीरे अब कुंभ का रूप ले चुका है। यह उत्तर भारत के प्रमुख मेलों में से एक है। प्रत्येक वर्ष मुड़िया पूर्णिमा और चैदस की रात गिर्राज परिक्रमा लगाने वाले श्रद्धालु भक्तों के लिये खास रहता है चैदस की रात में श्रद्धालु भक्तों को जनसेलाव गिरिराज प्रभु की सप्तकोसिय परिक्रमा के लिये उमडता है। जनसेलाव का प्रशासन आॅकलन भी नही कर पाता। यही कारण हैं कि हर बार प्रशासन की व्यवस्थाएं नाकाफी साबित होती है। लिहाजा सुरक्षा की द्रष्टि से गुरूपूर्णिमा मेला में आने वाले करोडों श्रद्धालु भक्तों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर शासन स्तर से माॅनिटिरिंग होती है। श्रद्धालु भक्तों की भीड़ को देखते हुए शुक्रवार को पुलिस एडीजी ने मेला क्षेत्र का निरीक्षण किया तथा पुलिस अधीक्षक मथुरा को चैकन्ना रहने के आदेश दिये।
कहा जाता है कि जब कृष्ण चैतन्य महाप्रभुजी का ब्रज में आगमन हुआ था। तभी से ब्रजधाम के सात्विक स्वरूप का प्राकटय हुआ उस समय दिल्ली में मुगल शासन था। उसी समय ब्रजधाम में भक्ति का स्वर्णयुग प्रारंभ हुआ। कृष्ण चैतन्य महाप्रभुजी के प्रमुख शिष्य श्री चैतन्य गौडीय संप्रदाय के आचार्य श्रीपाद सनातन गोस्वामी महाराज इस स्वर्ण युग के नायक थे। सनातन गोस्वामी जी महाराज का अविर्भाव सन् 1488 में पश्चिम बंगाल के भारद्धाज गोत्रीय यजुर्वेणीय कर्णाट विप्र परिवार में हुआ था। वह पश्चिम बंगाल में मुगल बादशाह हुसैन शाह के प्रधानमंत्री थे। राजकीय ठाटबाट से रहने पर भी मन तृप्त नही हुआ। चैतन्य महाप्रभु का दर्शन कर संसार में वैराग्य हो गया।
गौस्वामी प्रभु पादजी की भजन कुटी आज भी गोवर्धन चकलेश्वर महादेव के सम्मुख विराजमान हैं। वृद्धावस्था में गौस्वामी पाद् गिर्राज महाराज एवं मानसीगंगा की परिक्रमा देने में अस्मर्थ होने पर स्वयं लीला निधान श्री कृष्ण ने अपने ही स्वरूप श्री गिर्राज को श्रीपाद गौस्वामी जी के लिये गिर्राज शिला भेंट की और कहा कि आप इस शिला की सात परिक्रमा कर लिया करों। श्री कृष्ण द्वारा श्री सनातन पाद गौस्वामी को भेंट की गई शिला में स्वयं लीला निधान श्री कृष्ण के चरण चिन्ह अंकित थे। यह शिला आज भी बृन्दावन के दामोदर मंदिर में विराजमान है।
सन् 1557 में दीर्घ 42 साल तक अंखड़ बृजवास एंव साहित्य गिर्राज गोवर्धन की अपार सेवा कर गुरू पूर्णिमा के दिन सनातन गोस्वामी निकुंज लीला में प्रवेश कर गए। सिर मुड़ाते रहने के कारण बृज में आप मुड़िया बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे। शौकाकुल बृजवासी मुड़िया बाबा के दर्शन के लिए आए।
बताते हैं कि माल्याभूषित कर उनके भक्त व बृजवासी तथा शिष्यों ने ंसिर मुड़ाकर श्रीपाद गौस्वामी के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर धारण कर मानसी गंगा की परिक्रमा लगाई। तव से लेकर आज तक गौडीय सम्प्रदाय के भक्त बृन्द व बृजबासी अपने गुरू श्रीपाद गौस्वामी की याद में इस परम्परा का निर्वाह करते चले आ रहे है। सिर मुडवाने के कारण इस गुरूपूर्णिमा पर्व को मुडियापूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। प्रति वर्ष इस तिथि को मुड़िया संकीर्तन शोभा यात्रा के साथ राधाश्याम सुन्दर मन्दिर में श्री माधव गौडे़श्वर सम्ंप्रदाय के विभिन्न अनुष्ठान होते हैं। इस पावन पर्व पर बृजवासी ही नही वरन भारत वर्ष के कोने.कोने से तो श्रद्धालु आते ही हैं अपितु विदेशी भक्त भी गुरूपूजा करने के लिये सात समुद्र पार कर श्रीधाम गोवर्धन में आकर गुरूपूजा करते है। और श्रीकृष्ण की भक्ती में लीन हो भक्ति रस का पान करते है। मुड़िया शोभायात्रा इसी परंपरा का एक हिस्सा है। मुड़िया मेले को 460 वर्ष वीं बार मानाया जा रहा है।













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