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मायरा की गुफा यही बैठ कर महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खायी थीं

घने जंगल में यह गुफा किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। प्रकृति ने इस दोहरी कंदरा को कुछ इस तरह गढ़ा है मानो शरीर में नाडिय़ां। शायद इसी वजह से इसे मेवाड़़ के महाराणा प्रताप ने अपना शस्त्रागार बनाया था। जी हां, हम बात कर रहे हैं मेवाड़ की विरासतों में शुमार मायरा गुफा की। बता दें कि इसी गुफा में बैठ कर महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खायी थीं।

वर्तमान में मोड़ी पंचायत (गोगुंदा) उदयपुर से करीब 30 किमी दूर स्थित मायरा गुफा में स्थित रसोई आज भी इस बात की गवाह बनी है।

सुरक्षा और बचाव के लिए तीन रास्ते : 

महाराणा प्रताप ने इस गुफा को अपना शस्त्रागार और शरण स्थली इसकी सुरक्षित संरचना की वजह से ही बनाया था। घने जंगल में स्थित होने से दुश्‍मन की आंखों से ओझल भी रहते थे और इसकी भूल भुलैया जैसी बनावट उन्‍हें और भी सुरक्षा प्रदान करती थी। दरअसल, इसमें प्रवेश के तीन रास्ते हैं, जो किसी भूलभुलैया से कम नहीं। हर तरफ से सुरक्षित।

यहीं बनती थी मुगलों से लोहा लेने की रणनीति : 

हल्दीघाटी युद्ध में मुगलों सेना के दांत खट्टे करने वाले और वर्षों तक अकबर से बराबर लोहा लेने वाले मेवाड़़ के राजा महाराणा प्रताप इसी गुफा में अपनी रणनीति बनाते थे। प्रताप की प्रतिज्ञा और बलिदान की गवाह है ये गुफा.

 

महाराणा प्रताप उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनका का जन्म महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ (राजस्‍थान) में हुआ था। उन दिनों दिल्ली में सम्राट अकबर का राज्य था जो भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था. मेवाड़़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने हेतु महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़़ आजाद नहीं होगा, मैं महलों को छोड़ जंगलों में निवास करूंगा, स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंदमूल फलों से ही पेट भरूंगा किन्तु, अकबर का अधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करूंगा। प्रताप के इसी बलिदान और शौर्य गाथा की गवार रही है यह मायरा गुफा।


मायरा में चेतक का भी था बसेरा : 

मायरा की गुफा में रसोई घर और शस्त्रागार के साथ अश्वशाला भी थी। अश्वशाला में चेतक को बांधा जाता था, इसलिए इसे आज भी पूजा जाता है।

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