BREAKING NEWS

स्विट्ज़रलैंड: पहाड़ों पर कुदरत का करिश्मा, मशीनों का जलवा और हम सबको ‘आज खाने में क्या है की चिंता?’ || लखनऊ : अखिलेश का दावा, SIR पर चुनाव आयोग में ही मतभेद, बताया- लोकतंत्र के लिए घातक || चेन्नई : राहुल गांधी अगले महीने तमिलनाडु में कर सकते हैं 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम || उत्तर प्रदेश : गोंडा में मुठभेड़ के बाद तीन गौतस्कर गिरफ्तार, बहराइच में शातिर अपराधी पुलिस की गोली लगने से घायल

जल्द ही अपने आप ठीक हो जाएंगे उपकरण, भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

जल्द ही ऐसा संभव हो सकता है कि अंतरिक्ष यान आदि में इस्तेमाल होने वाले, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण क्षतिग्रस्त होने पर खुद ही ठीक हो जाएं। वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में ऐसा पदार्थ विकसित किया गया है जो यांत्रिक टक्कर से उत्पन्न इलेक्ट्रिकल चार्ज की मदद से अपनी यांत्रिक क्षति की मरम्मत कर सकता है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इस पीजोइलेक्ट्रिक मॉलिक्यूलर को बाइपाइराजोल ऑर्गेनिक क्रिस्टल कहा जाता है जो बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के यांत्रिक टूटफूट के बाद क्रिस्टलोग्राफिक परिशुद्धता के साथ मिलीसेकंड में बिना किसी की मदद के फिर से जुड़ जाते है।

अंतरिक्ष यानों में मरम्मत एक बड़ी समस्या
जिन उपकरणों का हम दैनिक उपयोग करते हैं वे अक्सर यांत्रिक क्षति के कारण खराब हो जाते हैं, जिससे हमें या तो उन्हें ठीक करना या बदलना पड़ता है। इससे उपकरण का जीवनकाल कम तो होता ही है और रखरखाव की लागत भी बढ़ जाती है। कई मामलों में, जैसे कि अंतरिक्ष यानों में, मरम्मत के लिए इंसानों की मौजूदगी संभव नहीं है। ऐसी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) कोलकाता के शोधकर्ताओं ने आईआईटी खड़गपुर के साथ मिलकर पीजोइलेक्ट्रिक मॉलिक्यूलर क्रिस्टल विकसित किए हैं, जो बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप की मदद के अपनी यांत्रिक क्षति को खुद ही ठीक करते हैं। पीजोइलेक्ट्रिक क्रिस्टल पदार्थों का एक समूह है, जो यांत्रिक प्रभाव से गुजरने पर विद्युत उत्पन्न करता है।

इलेक्ट्रिक चार्ज उत्पन्न करने की अनूठी क्षमता
इस पदार्थ में, यांत्रिक प्रभाव की वजह से इलेक्ट्रिक चार्ज उत्पन्न करने की अनूठी क्षमता होती है। इस पदार्थ से बने उपकरणों के क्षतिग्रस्त हिस्से से टूटे हुए टुकड़े इलेक्ट्रिक चार्ज उत्पन्न करते हैं, जिससे क्षतिग्रस्त हिस्सों द्वारा उन्हें वापस अपनी तरफ खींचा जाता है और शुद्धता और स्वायत्तता के साथ मरम्मत हो जाती है। सी एम रेड्डी को स्वर्णजयंती फैलोशिप के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार और विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (एसईआरबी) अनुसंधान अनुदान के द्वारा समर्थित यह रिसर्च हाल ही में जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित किया गया है।

प्रकृति में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं ‘क्रिस्टल’
अणुओं या आयनों की पूर्ण आंतरिक व्यवस्था वाले इन पदार्थों को ‘क्रिस्टल’ कहा जाता है, जो प्रकृति में प्रचुर मात्रा में होते हैं। इस प्रक्रिया को शुरू में आईआईएसईआर कोलकाता टीम द्वारा प्रोफेसर सी मल्ला रेड्डी के नेतृत्व में विकसित किया गया था, जिन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा 2015 में स्वर्णजयंती फेलोशिप मिली थी। जी.जी. स्टोक्स अवॉर्ड 2021 के विजेता और आईआईएसईआर कोलकाता के प्रो. निर्माल्य घोष, जो ऑप्टिकल पोलराइजेशन में सोसाइटी ऑफ फोटो-ऑप्टिकल इंस्ट्रुमेंटेशन इंजीनियर्स (एसपीआईई) हैं, ने पीजोइलेक्ट्रिक ऑर्गेनिक क्रिस्टल की उत्कृष्टता को जांचने और मापने के लिये विशेष रूप से तैयार अत्याधुनिक पोलराईजेशन माइक्रोस्कोपिक सिस्टम का उपयोग किया।

हाई-एंड माइक्रो चिप और माइक्रो रोबोटिक्स में हो सकता है इस्तेमाल
आईआईटी खड़गपुर की टीम, प्रो. भानु भूषण खटुआ और डॉ. सुमंत करण ने यांत्रिक ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम उपकरणों के निर्माण के लिए नई पदार्थ के प्रदर्शन का अध्ययन किया। नये पदार्थ का हाई-एंड माइक्रो चिप, ऊंची परिशुद्धता वाले मैकेनिकल सेंसर, एक्चुएटर्स, माइक्रो रोबोटिक्स में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे पदार्थों के इस्तेमाल और शोध से आने वाले समय में ऐसे स्मार्ट गैजेट्स विकसित हो सकते हैं जो खुद ही क्रैक और स्क्रैच को ठीक कर सकेंगें। यह अणु विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की एक बड़ी उपलब्धि है।

नारद संवाद

देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि

Read More

हमारी बात

स्विट्ज़रलैंड: पहाड़ों पर कुदरत का करिश्मा, मशीनों का जलवा और हम सबको  ‘आज खाने में क्या है की चिंता?’

Read More

Bollywood


विविधा


शंखनाद

राइन फॉल्स, स्विस सीढ़ियाँ और बुज़ुर्ग घुटने: नाव की सैर बनी ओलंपिक प्रतियोगिता!

Read More