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जब राजा के सोने के मुकुट में कलियुग बैठ गया 

(पवन गौतम)  ज्यादा पुराना दौर नहीं है हमें 22 साल पहले जाना होगा हम अपने आस पास देखंगे की हमारे पास जो सुविधा आज है वो उस समय नहीं हुआ करती थी. मोबाइल क्रांति का दौर शुरू होने वाला था बाजपेयी जी ने कई अच्छे कामों को अंजाम दिया था. उसी दौरान मनमोहन जी की यात्रा भी शुरू होनी थी. भारत में ये दौर ऐसा था की हर व्यक्ति एक अलग सोच और एक नए आयाम के साथ आगे बढ़ रहा था. इस दौर में लोगों ने अपने विकास की क्रांति लिखी। अगर हम ये कह सके की उन सालों में एक नई व्यवस्था का उदय हो रहा था. सोचनीय बात ये है की शहर के 100 मकानों के बीच किसी एक पर चार पहिया वाहन हुआ करता था. मोबाइल रखना आम लोगों के बस में नहीं था. ऐसा क्या हुआ 2000 से 2012 तक की हर तरफ प्रति व्यक्ति का विकास हुआ. सोचिये अगर ये संभव था तो आज ऐसा क्या हुआ.... ?  सब धीरे धीरे एक जहर घुल रहा है. जो आने वाले समय में घातक सिद्ध होगा। जब राजा परीक्षित से कलियुग की भेट हुयी थी तब उसने स्थान माँगा परीक्षित ने उसे धरती पर रहने के लिए जुआं, मदिरा, परस्त्रीगमन और हिंसा जैसी चार जगह दे दी। पर उसके साथ एक स्थान और दिया स्वर्ण में. उससे पहले वो कुछ समझ पाते उनके ही मुकुट में जो सोने का था उसमे ही वास कर लिया। ये बात हमें ये सिखाती है की राजा अगर प्रजा को छोड़कर सिर्फ अपने ही दयारे में सोचता है. वो उस कलियुग की छत्रछाया में रहता है. वैसे ईश्वर की बनायीं हुयी सत्ता का जिसने दुरुपयोग किया उसका तो वो खुद जिम्मेदार होता है. हरिबोल 

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