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वोकल फॉर लोकल: शॉल और टोपी के बाद अब कुल्लू की साड़ी भी बाजार में आने को तैयार

अपनी प्राकृतिक सुंदरता शॉल और टोपी के लिए देश और दुनिया में प्रसिद्ध कुल्लू घाटी अब कुल्लवी साड़ी के लिए भी जानी जाएगी। फैशन के मौजूदा दौर में कुल्लवी साड़ी बाजार में आने को तैयार है। इसके लिए सरकार के साथ-स्थानीय कारिगर अहम भूमिका निभा रहे हैं।  
 
देश में जल्द मिलेगी कुल्लवी साड़ी 

स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की केंद्र सरकार की योजनाएं हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी की आर्थिक तस्वीर को बदलने जा रही है। अभी तक कुल्लू घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शॉल, टोपी के लिए विख्यात थी लेकिन शीघ्र ही ये घाटी हथकरघा पर बनी साड़ी के लिए भी जानी जाएगी। यह संभव हुआ स्थानीय हथकरघा कारीगरों व जिला प्रशासन और भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से। इस संबंध में कुल्लू की उपायुक्त रिचा वर्मा का कहना है कि प्रशासन कुल्लू की साड़ी का प्रदेश के बाहर मार्केटिंग की व्यवस्था करेगा, ताकि ये साड़ी देश भर में बिक सके।
 
कुल्लू से बाहर मार्केटिंग के लिए किए जा रहे प्रयास

उन्होंने यह भी कहा, साड़ी एक ऐसा परिधान है जो भारत के हर राज्य की महिलाएं पहनती हैं। इसलिए सबसे पहले तो जो भी पर्यटक आएगा इसे खरीदेगा। इसके अलावा हिमाचल से बाहर इसके बाजार के लिए प्रयास करेंगे ताकि यह कुल्लू के बाहर भी जाए। इसके लिए भारत सरकार का टेक्सटाइल मंत्रालय और हिमाचल प्रदेश का उद्योग विभाग साथ मिल कर काम कर रहे हैं। हमारे पास मास्टर ट्रेनर हैं और कुछ फैशन डिजाइनर को भी जोड़ा गया है।
 
बुनकरों को 45 दिन की दी जा रही ट्रेनिंग

वहीं, केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय के सहायक निदेशक अनिल साहू का दावा है कि कुल्लू शॉल की कुल्लवी साड़ी भी अलग पहचान बनाएगी। इसके लिए 20 बुनकर हैं जिनमें 17 महिलाएं हैं। इनको 45 दिन की बुनाई ट्रेनिंग दे रही हैं। शॉल,टोपी के अलावा इन्हें कुल्लवी वुलेन साड़ी बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। उम्मीद है कि आने वाले समय में इससे रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा।

नारद संवाद

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