देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। समय के साथ नदियों का प्रवाह बदलता रहा है। यमुना नदी के साथ भी यह हुआ है। यमुना नदी के प्रवाह में परिवर्तन पर अध्यन कर रहे सुनील शर्मा का कहना है कि पिछले 40 साल में जिस तरह से नदी के प्रवाह में परिवर्तन हुआ है वह चैंकाता है।
सुनील शर्मा के मुताबिक भगवान श्री कृष्णचन्द्र की जन्मभूमि मथुरापुरी भारत वर्ष की सप्त महापुरियों में एक विख्यात नगरी है। भारतीय धर्मप्राण जनता के मन पर मथुरा नगरी का अत्यन्त प्रभाव रहा है।
त्रेतायुग में यहां मधु नामक असुर मधुदैत्य राजा की राजधानी मधुपुरी थी यह स्थान महोली गांव के नाम से वर्तमान शहर के दक्षिण-पश्चिम में करीब चार मील दूर है। सहित्यिक किंवदन्ती यह है कि जब श्री रामचन्द्र जी के छोटे भाई शत्रुघ्नजी ने लवणासुर दैत्य का दमन कर दिया तब उन्होंने मधुपुरी के नाम से एक नगर की स्थापना यमुना के किनारे पर की थी। यह मधुपुरी या मधुरा ही मथुरा नाम से प्रसिद्ध हुई।
प्राकृत उदाहरण के नियमों के अनुसार मथुरा और मधुरा दोनों ही शब्द मान्य हैं। इसका वर्णन (माधुरिय सुत्तान्त, मज्झिम निकाय, 2।4।4) में मिलता है। यह नवीन स्थापना के बाद मधुरापुरी का उत्कर्ष बहुत बढ़ा। यहीं पर यमुना के तट पर महाभारत कालीन मथुरापुरी बसी हुई थी, जिस समय कि भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का जन्म इस पुण्यभूमि पर हुआ। विद्वानों के मत से इस प्राचीन मथुरा नगरी का केन्द्र कटरा केशवदेव क्षेत्र होना चाहिए।
कनिंघम ने स्वलिखित पुरातव्त विभाग की रिपोर्टों में इसका विस्तार के साथ विचार करने के बाद यही सम्मति निश्चित की कि कटरा केशवदेव के उत्तर और पश्चिम की ओर फैले खँडहरों का सिलसिला ही प्राचीन मथुरा नगर का प्रमाण हैं। महाभारत काल में तो यमुना नदी गोर्वधन में बहती थी। यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला।
सुनील शर्मा का कहना है कि आज जहां से यमुना का प्रवाह है, वहा वह सदा से प्रवाहित नहीं होती रही है। पौराणिक अनुश्रुतियों और ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है, कि यमुना नदी ने समय के साथ-साथ अपना स्थान भी बदला है। जबकि यमुना पिछले हजारों वर्षो से हमारे जीवन की धारा के रूप में विधमान है, तथापि इसका प्रवाह समय-समय पर परिवर्तित होता रहा है।
महाभारत काल से वर्तमान तक यमुना की बदलती धारा के विषय में ज्ञात होता है कि यमुना कभी नन्दगांव, बरसाना, गोर्वधन के निकट से होकर बहती थी। यमुना ने अपने दीर्घ जीवन काल में कितने स्थान वदले है, उनमें से बहुत कम की ही जानकारी हो सकी है। मगर एक प्राचीन महाभारत काल के एक मानचित्र के अनुसार यह अवश्य ज्ञात होता है कि यमुना की धारा गोर्वधन के निकट से बहती थी।
श्री शर्मा का मानना है कि प्राचीन काल में यमुना मधुबन के समीप से बहती थी, जहां उसके तट पर शत्रुध्न जी ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि श्रीकृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के निकट था। सत्रहवीं शताबदी में भारत आने वाले यूरोपीय विद्वान टेवर्नियर ने कटरा के समीप की भूमि को देख कर यह अनुमानित किया था कि वहां किसी समय यमुना की धारा थी।
इस संदर्भ में मथुरा के तत्कालीन जिला कलेक्टर मथुरा के अजायब घर के संस्थापक ग्राउज का मत है कि ऐतिहासिक काल में कटरा के समीप यमुना के प्रवाहित होने की संभावना कम है, किन्तु अत्यन्त प्राचीन काल में वहाँ यमुना का प्रवाह अवश्य था। इस बात से यह सिद्ध होता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के समीप ही था।
कनिधंम का अनुमान है, यूनानी लेखकों के समय में यमुना नदी की एक मुख्य धारा या उसकी एक बड़ी शाखा कटरा केशव देव की पूर्वी दीवाल के नीचे से बहती होगी। जब मथुरा में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हो गया और यहाँ यमुना के दोंनों ओर अनेक संधाराम बनाये गये, तव यमुना की मुख्य धारा कटरा से हटकर प्रायः उसी स्थान पर बहती होगी, जहाँ वह अब है, किन्तु उसकी कोई शाखा अथवा सहायक नही कटरा के निकट भी विधमान रही होगी।
ऐसा अनुमान है, यमुना की वह शाखा बौद्ध काल के बहुत बाद तक संभवतः सोलहवीं शताब्दी तक केशव देव मन्दिर के नीचे बहती रही थी। पहले दो बरसाती नदियाँ ‘‘सरस्वती’’ और ‘‘कृष्ण गंगा’’ मथुरा के पश्चिमी भाग में प्रवाहित होकर यमुना में गिरती थीं, जिनकी स्मृति में यमुना के सरस्वती संगम और कृष्ण गंगा नामक धाट आज भी इतिहास के गबाह वने हुए हैं। संभव है यमुना की उन सहायक नादियों में से ही कोई कटरा केशव देव के पास से होकर बहती रही हो।
प्राचीन ग्रन्थों से ज्ञात होता है, प्राचीन वृन्दावन में यमुना गोवर्धन के निकट प्रवाहित होती थी। जबकि वर्तमान में वह गोवर्धन से लगभग कई मीलों दूर हो गई है। गोवर्धन के निकटवर्ती दो छोटे ग्राम ‘‘जमुनावती’’ और पारसौली है। वहाँ किसी काल में यमुना के प्रवाहित होने के उल्लेख मिलते हैं।
बल्लभ कुल सम्प्रदाय के वार्ता साहित्य से ज्ञात होता है कि सारस्वत कल्प में यमुना नदी जमुनावती ग्राम के समीप बहती थी। उस काल में यमुना नदी की दो धाराऐं थी, एक धारा नंदगाँव, वरसाना, संकेत के निकट वहती हुई गोबर्धन में जमुनावती पर आती थी और दूसरी धारा चीर घाट से होती हुई गोकुल की ओर चली जाती थी। आगे दोनों धाराएँ एक होकर वर्तमान आगरा की ओर बढ़ जाती थी।
परासौली में यमुना नदी की धारा प्रवाहित होने का प्रमाण स. १७१७ तक मिलता है। यद्यपि इस पर विश्वास करना कठिन है। श्री गंगाप्रसाद कमठान ने ब्रजभाषा के एक मुसलमान भक्तकवि कारबेग उपमान कारे का वृतांत प्रकाशित किया है। काबेग के कथनानुसार जमुना के तटवर्ती पारसौली गाँव का निवासी था और उसने अपनी रचना सं 1717 में रचित है।
अगर 40 वर्षों अन्तराल में देखा जाय तो यमुना अपने वर्तमान स्थान से लगभग 2.5 किलोमीटर पूर्व दिशा की ओर चली गयी है। यही इस वात का प्रमाण है कि यमुना नदी अपने वास्तविक स्थान और घाटों को छोड़ चुकी है। कभी यमुना नदी चक्रतीर्थ घाट, कृष्णगंगा घाट, गऊघाट, स्वामी घाट, आदि घाटों के सहारे बहती थी, मगर आज यमुना नदी हंसारानी घाट की चली गयी है और पुराने घाटों पर यमुना आज नहीं है।













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