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MATHURA : नशाखोरी का प्रभाव भावी पीढ़ियों पर पडता है

मथुरा। अभक्ष्य भोजन और नशाखोरी का प्रभाव भावी पीढ़ियों पर पड़े बिना नहीं रह सकता। खान-पान का हमारे विचार और चिंतन के साथ गहरा सम्बन्ध है। माँसाहार गर्म मिजाज भोजन है। यह दूषित विचारों का जनक, आचरणहीनता, क्रोध, उन्माद, हिंसा व अपराध का कारण है। शराब में हजारों बुराईयाँ हैं। थोड़े से राजस्व के लोभ में नयी पीढ़ी व आम जनता को नशाखोरी की इल्लत में झोंकना बुद्धिमानी नहीं। शराब और माँस महामारी के अच्छे वाहक हैं। इनके सेवन से मानसिक व वैचारिक विकृति की जो महामारी फैलेगी, वह कोविड-19 से भी भयानक है।
यह उद्गार हैं जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था, मथुरा के महामंत्री व राष्ट्रीय उपदेशक बाबूराम यादव के जो उन्होंने परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के 17 से 21 मई तक पांच दिवसीय वार्षिक भण्डारा महापर्व की समापन तिथि पर देशभर में फैले जयगुरुदेव संस्था के अनुयायियों को आॅन लाइन सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कोरोना मीटर के ताजा आंकड़ों पर गहरी चिंता व्यक्त की। संक्रमण की वृ(ि में माँस, मछली, अण्डे व शराब की दुकानों को खोलना सहायक बताया। देश व प्रदेश के कर्णधारों को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। मानस की पंक्तियों को याद कराते हुए कहा कि ‘‘अर्क जवास पात बिनु भयऊ, जस सुराज खल उद्यम गयऊ।’’ बरसात की ऋतु आने पर अर्क और जवास यानि मदार आदि के  पत्ते  झड़कर सिर्फ डंठल  बचता है। जैसे ‘सुराज’ आने  पर दुष्टों के उद्यम, दुष्टता प्रजनक धन्धे खत्म हो जाते हैं। बुराईयों की जड़ माँसाहार और शराब को बढ़ावा देना सुराज की भावना से दूर हो जाना है।
बाबा जयगुरुदेव की संस्था के महामंत्री ने अपने संस्था प्रमुख की अपील के दृष्टिगत माँस, मछली, अण्डे व शराब की दुकानें बन्द करने की अपील दुहराई है।

 

नारद संवाद

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