देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreबृज खंडेलवाल
भारत की राजनीति में विचारधाराएँ अब जाति के आगे नतमस्तक हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन इतिहास बन चुके हैं, राष्ट्रवाद थका हुआ दिखता है, और धर्म की अफीम भी जातीय दीवारों को ढहाने में असमर्थ रही है। जाति अब भारतीय समाज की आत्मा में गहराई तक समा चुकी है। समाजवाद, राष्ट्रवाद या धर्मनिरपेक्षता—राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में दर्ज हर ‘वाद’—अंततः इसलिए विफल रहा क्योंकि जाति का मकड़जाल कभी टूटा ही नहीं। यही हमारी सामाजिक संरचना की रीढ़ और चुनावी राजनीति की सबसे कारगर रणनीति बन गई है।
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आज भारतीय राजनीति विचारधारा नहीं, बल्कि जाति की चौपालों में सिमट गई है। हर चुनाव जातीय गणित का अखाड़ा बन गया है। राजनीतिक दल जनता के नहीं, बिरादरियों के प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं—कहीं जाटों की आवाज़, कहीं यादवों का परचम, तो कहीं ब्राह्मणों की ढाल। लोकतंत्र की आत्मा—समानता और समरसता—इन जातीय ठेलों में दम तोड़ रही है। सत्ता का हर सौदा जाति की तराजू पर तौला जाता है, और ‘भारत’ धीरे-धीरे ‘जातिस्तान’ में बदलता जा रहा है। सवाल वही पुराना है—क्या यही सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था?
हकीकत यह है कि राजनीति जातीय और सामुदायिक समीकरणों की धुरी पर घूमती है। राजनीतिक दल अब वैचारिक आंदोलनों के बजाय जातीय गठबंधन बन चुके हैं। समाजवादी अब डॉ लोहिया की जाति तोड़ो मुहिम का हिस्सा बनने से कतराते हैं।
लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययनों और बिहार के जाति सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि दल अपने-अपने राज्यों की सामाजिक संरचना के अनुसार खुद को ढालते हैं। 1990 के दशक में समाजवादी पार्टी को ‘यादव पार्टी’, बसपा को ‘दलित पार्टी’ और आरजेडी-जेडीयू को पिछड़े वर्गों का मंच कहना आम था। दो दशक बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला है—सिर्फ पैकेजिंग बदली है।
2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा का मजबूत आधार उच्च जातियों में है, जहाँ उसका वोट शेयर 50 प्रतिशत से अधिक था। उसका विस्तार गैर-प्रभावी ओबीसी और गैर-जाटव दलित समूहों के समर्थन से हुआ, जहाँ क्रमशः 42% ओबीसी और 33% दलितों ने भाजपा को चुना। कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अब मुख्यतः मुसलमानों, दलितों और विशिष्ट ओबीसी समूहों पर निर्भर हैं। सभी ‘विकास’ की बातें करते हैं, पर उम्मीदवार चयन या गठबंधन निर्माण में जातीय समीकरण ही निर्णायक कारक साबित होते हैं।
जाति की जमीनी सच्चाई का सबसे ताज़ा प्रमाण बिहार का 2023 का जाति सर्वेक्षण है। इसमें ओबीसी (27.13%) और अति पिछड़ा वर्ग (36.01%) मिलकर राज्य की 63% आबादी बनाते हैं, जबकि अनुसूचित जातियाँ 19.65% और जनजातियाँ 1.68% हैं। दूसरे शब्दों में, चार में से तीन बिहारी संवैधानिक रूप से ‘वंचित वर्गों’ से हैं। कोई भी दल इस बहुसंख्यक आबादी की भागीदारी के बिना सत्ता में नहीं आ सकता। इसलिए 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले एनडीए और महागठबंधन दोनों ही लगभग तीन-चौथाई उम्मीदवार ओबीसी, ईबीसी या दलित वर्गों से उतार रहे हैं।
चुनावी टिकट वितरण पर हुए शोध बताते हैं कि यह स्थानीय जाति संरचना के अनुरूप तय किया जाता है। दल बूथ स्तर तक यह विश्लेषण करते हैं कि किसी क्षेत्र में कुर्मी, कोइरी, जाटव या पासी समुदाय का कितना अनुपात है। यह न तो नैतिकता का प्रश्न है और न अवसरवाद का—यह चुनावी यथार्थ है। भारत जैसे देश में, जहाँ जाति सामाजिक विश्वास और नेटवर्क की नींव है, वहां किसी भी उप-जाति का भरोसा जीतने वाला उम्मीदवार सबसे व्यवहारिक विकल्प माना जाता है। जाति अब केवल पहचान नहीं, बल्कि संगठन और जुटाव की अदृश्य संरचना है।
फिर भी, पिछले एक दशक में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है। कल्याणकारी योजनाओं ने जाति-आधारित राजनीति को नया रूप दिया है। मुफ्त राशन, आवास, एलपीजी और चिकित्सा जैसी योजनाओं ने एक नए ‘लाभार्थी वर्ग’ का निर्माण किया है—जो जातीय सीमाओं के पार जाकर सत्ता को सीधे लाभ का स्रोत मानता है। उदाहरण के लिए, भाजपा ने 2014–2019 के बीच गरीब ओबीसी और दलितों में अपना वोट शेयर बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों में भाजपा को 4.6% अधिक वोट मिले। लेकिन हर जाति के भीतर लाभार्थी उसी दल को प्राथमिकता देते हैं जिसे वे अपने हितों का प्रदाता मानते हैं।
राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता या कल्याणवाद—ये सभी वैचारिक आवरण जातीय राजनीति को समाप्त नहीं कर पाए। वे केवल उसके ऊपर एक नई परत चढ़ाते हैं। एक यादव मतदाता सामाजिक न्याय की भाषा बोलते हुए भी अपनी जातीय निष्ठा से समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा रहता है। एक ब्राह्मण राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा को चुनता है, पर साथ ही यह उम्मीद रखता है कि मंत्रिमंडल में उसकी जाति का प्रतिनिधित्व होगा। यानी भारतीय दल अब वैचारिक पोशाक में लिपटे जातीय गठबंधन मात्र हैं—जहाँ विचारधारा सतही है और जातीय समीकरण मूल ढांचा।
विचारधारा, योग्यता और आधुनिकीकरण की चर्चाएँ जारी हैं, लेकिन चुनाव वही जीतता है जो जातियों का सबसे बड़ा गठबंधन रच सके। प्रशांत किशोर भी इस हकीकत से अब वाकिफ हो चुके हैं।













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