देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreआज का विचार : जीव अपनी यात्रा में सुख और दुःख से निकलता हुआ...परम धाम यात्रा पे निकल जाता है...पर सोचनीय बात ये है क्या जीव अपने कर्म का चक्र पूरा कर पता है...नहीं.... क्योंकि जीव सा सबसे बड़ा शत्रु यहां मोह है जो उसे निकलने नहीं देता...वो अपनो के बीच भंवर में फसा रहता है और अंत समय आने पे उन्ही के बारे में सोचता रहता है...हमारे कर्म के चक्र उसे इस धरा पे लौटकर फिर लाते रहते है.....इसलिए जीव को मोह का त्याग धीरे धीरे करते रहना चाहिए....ताकि इस से निकल पाए... क्योंकि जीव के यहां के रिश्ते ये मेरी मां, पिता, भाई, बहन, पत्नी, बच्चे, बहुत रिश्तों की डोर से बंधा रहता है...जिस से खोल पाना संभव नहीं हो पाता...इसलिए संतुलन को बनाए रखना ही जीव को मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खोलता है.......आगे हरिहर इच्छा....













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