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क्या अभी और शव यात्राओं का इंतजार करें?

एक "लाइक" के लिए कितने और बच्चे मरने चाहिए? यह सवाल दिल दहला देने वाला है।  लेकिन भारत को इसका सामना करना पड़ेगा।   दुनिया भर में हुकूमतें जाग रही हैं।   ऑस्ट्रेलिया ने पूरे देश में 16 साल से कम उम्र वालों पर सोशल मीडिया बैन लगा दिया है। अकाउंट्स डीएक्टिवेट। प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी।  
न्यूजीलैंड भी ऐसा ही कानून ला रहा है। जर्मनी में सीडीयू पार्टी ने 14 साल की न्यूनतम उम्र का प्रस्ताव दिया है, सख्त उम्र वेरिफिकेशन के साथ।  सीडीयू का प्रस्ताव राष्ट्रीय और यूरोपीय कानून चाहता है, जो मजबूत, डेटा प्रोटेक्शन वाले उम्र वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करें (सिर्फ खुद की घोषणा से आगे)। न मानने पर भारी जुर्माना लगे। साथ ही, पूरे यूरोप में एक जैसी उम्र की स्टैंडर्ड्स लाने को कहा है, ताकि लूपहोल्स न रहें। पार्टी स्कूलों में डिजिटल लिटरेसी एजुकेशन पर जोर देती है ,  अल्गोरिदम, साइबरबुलिंग और ऑनलाइन साजिशों के बारे में बच्चों को सिखाना। पैरेंट्स और कम्युनिटी को भी इसमें शुमार किया जाए।  
फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन और ब्रिटेन सख्ती बढ़ा रहे हैं।  और भारत?   हम स्क्रॉल करते हैं। बहस करते हैं। टालते हैं।  इधर रील्स घूमती रहती हैं। अल्गोरिदम शिकार करता है। बचपन खतरे में पड़ रहा है।   हम ये नाटक न करें कि ये महज एंटरटेनमेंट है। सोशल मीडिया कोई खेल का मैदान नहीं। ये मुनाफे की मशीन है। अल्गोरिदम खतरे को इनाम देता है। डेंजर वायरल हो जाता है। सावधानी ट्रेंड नहीं करती।   अमेरिका में टीनएजर्स वायरल चैलेंज करते हुए मरे। एक स्पीडिंग गाड़ी के पीछे फोल्डिंग टेबल पर लटका। दूसरा मूविंग कार के ट्रंक से गिरा। सब views के लिए। डिजिटल तालियों के लिए।  
"ब्लैकआउट चैलेंज" ने 12 साल से छोटे बच्चों की जान ली। बच्चे खुद को गला दबाकर अजनबियों को इम्प्रेस करने की कोशिश में।  


ये इनोवेशन है? या पागलपन?  भारत को छूट नहीं।  मध्य प्रदेश में एक जवान 50 फीट गिरा "गोल्डन ऑवर" रील बनाते हुए।  मुंबई में एक इन्फ्लुएंसर खाई में गिरा कंटेंट क्रिएट करते हुए।  एक और युवा ने फायर स्टंट ट्राई किया। झुलस गया वो बुरी  तरीके से।  ये अलग-थलग हादसे नहीं। ये डिजिटल डेयरडेविलरी की कल्चर है। और हमारे बच्चे इसके सबसे कमजोर कड़ी।  साइबरबुलिंग जहर बन चुका है , क्रूर और लगातार। स्कूल की घंटी इसे नहीं रोकती। क्लासरूम की दीवारें इसे नहीं रोक पातीं।  


स्टडीज कहती हैं, साइबरबुलिंग के शिकार दो गुना ज्यादा सुसाइड ट्राई करते हैं। ज्यादा सोशल मीडिया यूज से उदासी, बेबसी, सेल्फ-हॉर्म लिंक होता है। टीनएजर के हाथ का फोन हथियार बन जाता है। गुमनाम। बेरहम।  nonstop।  सेक्सटॉर्शन गैंग्स 13 साल के लड़कों को फंसाते हैं। ऑनलाइन शिकारी गेम्स और चैट्स से बच्चों को फंसाते हैं। हिंसक ग्रुप्स माइनर्स को डार्क नेटवर्क में भर्ती करते हैं।  


ग्लोबल पुलिस रिपोर्ट्स में हजारों केस। बच्चों को सेल्फ-हॉर्म पर मजबूर। ब्लैकमेल। सुसाइड तक धकेल। फिर भी हम कहते हैं, "डिजिटल इंडिया को बढ़ना चाहिए।" हां, बढ़ना चाहिए। लेकिन  हमारे बच्चे इसका नुकसान क्यों झेलेंं?  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन कहता है, 11% एडोलसेंट्स में सोशल मीडिया का खतरनाक यूज दिखता है।  लत जैसी आदतें। नींद खराब। ग्रेड्स गिरते। एंग्जायटी। डिप्रेशन। 2010 से, जहां स्मार्टफोन फैला, वहां टीनएजर्स में डिप्रेशन तेजी से बढ़ा।  कनेक्शन? संयोग?  या नतीजा?  


भारत में, जहां मेंटल हेल्थ सिस्टम पहले ही कमजोर है, क्या हम ये खामोश महामारी झेल सकते हैं?   ईमानदारी से कहें। पैरेंट्स परेशान। स्कूल तैयार नहीं। प्लेटफॉर्म्स जवाबदेह नहीं। उम्र की लिमिट कागज पर है। बच्चे सेकंड्स में बायपास कर देते।  अगर शराब और ड्राइविंग पर उम्र रेस्ट्रिक्शन है, तो अटेंशन हाईजैक करने वाली डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर क्यों नहीं?  


बैन के खिलाफ बहस वही पुरानी।  
"बच्चों को डिजिटल स्किल्स चाहिए।"  
"बैन से अंडरग्राउंड चले जाएंगे।"  
"एनफोर्समेंट मुश्किल।"  
हां, मुश्किल है।  
लेकिन मुश्किल inaction का बहाना नहीं।  
ऑस्ट्रेलिया ने एक्शन लिया।  
जर्मनी मजबूत वेरिफिकेशन और भारी फाइन मांग रहा।  
यूरोपियन देश लूपहोल्स बंद करने को एकजुट हो रहे।  
भारत क्यों पीछे?  


हम डेमोग्राफिक डिविडेंड की बात करते हैं।  लेकिन डिविडेंड के लिए हेल्दी दिमाग चाहिए।  यंग इनोवेटर्स को सेलिब्रेट करते।  लेकिन इनोवेशन को फोकस चाहिए, टूटे अटेंशन स्पैन नहीं।  ये टेक्नोफोबिया नहीं।  ये टाइमिंग की बात है।  16 से कम उम्र फॉर्मेटिव है।  इंपल्स कंट्रोल अभी बन रहा। आइडेंटिटी नाजुक। पीयर प्रेशर तीव्र। क्या हम सिलिकॉन वैली के अल्गोरिदम को वो दिमाग शेप करने देंगे?  कैलिब्रेटेड अप्रोच मुमकिन।   सख्त उम्र वेरिफिकेशन। प्लेटफॉर्म्स पर भारी सजा।  


स्कूलों में डिजिटल लिटरेसी ,  अल्गोरिदम, मैनिपुलेशन, साइबरबुलिंग सिखाओ। पैरेंट्स अवेयरनेस प्रोग्राम। ग्रेजुअल एक्सेस सेफगार्ड्स के साथ।   लेकिन बिना फर्म लीगल बॉउंड्री, सब एडवाइजरी रह जाता।  और एडवाइजरी बिलियन डॉलर tech giants के आगे कमजोर पड़ जाती है।  


भारत ने चाइनीज ऐप्स रातोंरात बैन किया नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर।  बच्चों की सिक्योरिटी के लिए नहीं कर सकते?  सवाल साफ। क्या हम प्रॉफिट बचाते? या बच्चे?   16 से कम पर सोशल मीडिया रेस्ट्रिक्ट हो। सख्त। क्लियर। कानूनी।  क्योंकि हर वायरल ट्रेजडी चेतावनी है। हर साइबरबुलिंग सुसाइड चीख। हर सेक्सटॉर्शन केस दाग।  कितनी और अलर्ट्स चाहिए?

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