देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
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जब दिल की गहराइयों से निकलकर रूह तक पहुंच जाने वाली आवाज की बात चलती है तो बस मुकेश का जिक्र होता है। अमर गायक मुकेश हमारे बीच तो नहीं हैं, लेकिन उनके गाए गीत आज भी करोड़ों दिलों की धड़कनों में बसे हैं। मुकेश की आवाज बहुत खूबसूरत थी की उनके एक दूर के रिश्तेदार मोतीलाल ने तब पहचाना जब उन्होंने उसे अपने बहन की शादी में गाते हुए सुना। मोतीलाल उन्हें मुंबई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिए रियाज का पूरा इन्तजाम किया। इस दौरान मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष में मुख्य कलाकार का काम मिला। पार्श्व गायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम में फिल्म पहली नजर में मिला। मुकेश ने हिन्दी फिल्म में जो पहला गाना गाया, वह था दिल जलता है तो जलने दे जिसमें अदाकारी मोतीलाल ने की। इस गीत में मुकेश के आदर्श गायक के एल सहगल के प्रभाव का असर साफ-साफ नजर आता है। 1959 में अनाड़ी फिल्म के ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ गाने के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था। मुकेश को रजनीगन्धा फिल्म में कई बार यूं भी देखा है गाना गाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
इनका जन्म 22 जुलाई 1923 को लुधियाना के जोरावर चंद माथुर और चांद रानी के घर हुआ था। इनकी बड़ी बहन संगीत की शिक्षा लेती थी और मुकेश बड़े चाव से उन्हें सुना करते थे। मोतीलाल के घर मुकेश ने संगीत की पारम्परिक शिक्षा लेनी शुरू की, लेकिन इनकी दिली ख्वाहिश हिन्दी फिल्मों में बतौर अभिनेता प्रवेश करने की थी।
मेरी आत्मा है मुकेश
मुंबई आने के बाद इन्हें 1941 में निर्दोष फिल्म में बतौर एक्टर सिंगर पहला ब्रेक मिला। इंडस्ट्री में शुरुआती दौर मुश्किलों भरा था। लेकिन के एल सहगल को इनकी आवाज़ बहुत पसंद आयी। इनके गाने को सुन के एल सहगल भी दुविधा में पड़ गये थे। 40 के दशक में मुकेश का अपना पार्श्व गायन शैली था। नौशाद के साथ उनकी जुगलबंदी एक के बाद एक सुपरहिट गाने दे रही थी। उस दौर में मुकेश की आवाज में सबसे ज्यादा गीत दिलीप कुमार पर फिल्माए गये। 50 के दशक में इन्हें एक नयी पहचान मिली, जब इन्हें राजकपूर की आवाज कहा जाने लगा। कई साक्षात्कार में खुद राज कपूर ने अपने दोस्त मुकेश के बारे में कहा है कि मैं तो बस शरीर हूं मेरी आत्मा तो मुकेश है।
पार्श्व गायक मुकेश को फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना मकाम हासिल कर लेने के बाद, कुछ नया करने की चाह जगी और इसलिए इन्होंने फिल्म निर्माता (प्रोड्यूसर) बन गये। साल 1951 में फ़िल्म मल्हार और 1956 में अनुराग निर्मित की। अभिनय का शौक बचपन से होने के कारण माशूका और अनुराग में बतौर हीरो भी आये। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ये दोनों फिल्में फ्लॉप रहीं। कहते हैं कि इस दौर में मुकेश आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे।
बतौर अभिनेता-निर्माता मुकेश को सफलता नहीं मिली। गलतियों से सबक लेते हुए फिर से सुरों की महफिल में लौट आये। 50 के दशक के आखिरी सालों में मुकेश फिर पार्श्व गायन के शिखर पर पहुंच गये। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी जैसी फ़िल्मों ने उनकी गायकी को एक नयी पहचान दी और फिर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गाने के लिए वे फिल्मफेयर के लिए नामांकित हुए।
60 के दशक की शुरुआत मुकेश ने कल्याण, आनंद, के डम-डम डीगा-डीगा, नौशाद का मेरा प्यार भी तू है, और एस. डी. बर्मन के नगमों से की और फिर राज कपूर की फिल्म संगम में शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध किया गाना, जिसके लिए इन्हें फिर से फ़िल्मफेयर के लिए नामांकित हुए।
साभार-khaskhabar.com













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