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75 का सवाल: क्या भाजपा तलाशेगी मोदी का विकल्प ?

2024 के इंडिया टुडे सर्वे के अनुसार, अमित शाह को 25% समर्थन के साथ सबसे आगे माना जा रहा है, क्योंकि उनके पास संगठनात्मक दक्षता और आरएसएस का समर्थन है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (19%) मजबूत दावेदार हैं, पर आरएसएस की जड़ों की कमी उनकी राह में बाधा बन सकती है। नितिन गडकरी (13%) और शिवराज सिंह चौहान (5.4%) भी विकल्प हैं, लेकिन लोकप्रियता में शाह या योगी जितने मजबूत नहीं। ये भी संभव है कि मोदी 75 के बाद भी बने रहेंगे, क्योंकि कोई औपचारिक नियम नहीं है और उनके समर्थन में कई भाजपा नेता हैं। आरएसएस की भी भूमिका महत्वपूर्ण होगी, खासकर यदि मोहन भागवत 2025 में पद छोड़ते हैं। उत्तराधिकारी चयन में मोदी की विरासत, गठबंधन राजनीति और 2029 चुनाव रणनीति का संतुलन अहम रहेगा।देश को एक ओर जहाँ मजबूत, स्थिर और प्रभावी नेतृत्व की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र में संतुलन, जवाबदेही और खुली प्रतिस्पर्धा की मांग भी बढ़ रही है। भारत इस वक्त  विषम अंतरराष्ट्रीय कुचक्र में फंसा दिखता है, खासतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रंप की षड्यंत्री चालों के बाद। देश के अंदर ही विपक्ष कोई मौका नहीं छोड़ रहा है मोदी जी की एप्पल कार्ट को असंतुलित करने का। ऐसी परिस्थितियों में मोदी के अलावा कोई और नेता नहीं दिखता जो भाजपा सरकार की नैय्या 2029 के चुनावों में पार लगा सके। इस बीच कुछ विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देते हैं—जहाँ सरकारी नौकरियों में सेवानिवृत्ति की उम्र सीमा 58_60 वर्ष है, वहीं गवर्नर, न्यायाधीश, कुलपति और अन्य उच्च पदाधिकारी 65 वर्ष या उससे अधिक आयु तक पद पर बने रहते हैं। राजनीतिक पदों पर आयु की कोई औपचारिक सीमा नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय नेतृत्व की परंपराएँ अक्सर अलिखित नियमों पर ही चलती रहती हैं।  भाजपा की एक अलिखित परंपरा रही है कि 75 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नेता सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर मार्गदर्शक की भूमिका निभाएँ। इसी नियम के तहत लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन और नजमा हेपतुल्ला जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मानपूर्वक पार्टी के मुख्य पदों से हटा दिया गया था।  2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने स्पष्ट कर दिया था कि 75 वर्ष से अधिक आयु के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजा जाएगा। यह कोई महज औपचारिकता नहीं थी, बल्कि पार्टी अनुशासन और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति थी। मोदी ने स्वयं इस नियम को दूसरों पर लागू किया था।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में वानप्रस्थ की परंपरा का उल्लेख किया था, जिसमें 75 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति सक्रिय जिम्मेदारियों से हटकर सलाहकार की भूमिका निभाता है। भारत की औसत आयु मात्र 28 वर्ष है, लेकिन देश की राजनीति आज भी वरिष्ठ नेताओं के हाथों में केंद्रित है। प्रौद्योगिकी, वैश्विक राजनीति, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक बदलाव जैसे जटिल मुद्दों के लिए नए विचार और ऊर्जा की आवश्यकता है। ऐसे में युवा नेतृत्व को मौका देना समय की मांग है।  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वेच्छा से राजनीति से संन्यास लेकर यह साबित किया था कि एक मार्गदर्शक भी नायक हो सकता है। यदि मोदी भी मार्गदर्शक मंडल में शामिल होते हैं, तो वे पार्टी को अपने अनुभव और दृष्टि से लाभान्वित कर सकते हैं, बिना उसकी स्वतंत्रता को प्रभावित किए।  भारत की युवा आबादी और बदलता वैश्विक परिदृश्य नए विचारों और गतिशील नेतृत्व की माँग कर रहा है। परंपरा और अनुभव को नकारना उतना ही खतरनाक है, जितना बिना आधार के केवल "नवीनता" को प्राथमिकता देना। अतः नेतृत्व परिवर्तन का ऐसा मॉडल होना चाहिए जो अनुभव को मार्गदर्शन में बदले, नई ऊर्जा को केंद्र में लाए और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता बनाए रखें।

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