देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। कामगारों के पलायन पर राजनीति खूब हो रही है, लेकिन इस पलायन की पडताल को कोई तैयार नहीं है। सैकडों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल भूख प्यासे लोग यूं ही नहीं निकल पडते हैं। यह जीवन बचाने की उनकी आखरी जद्दो जहद होती है। अपने ठिकाने तक पहुचेंगे या मर जाएंगे। पूर्णबंदी को लेकर बने अनिश्चितता के माहौल में भूख और एक अपरिभाषित डर की वजह से प्रवासी मजदूरों का पलायन रुक नहीं पा रहा है।
ऐसा ही एक दुरूखद दृश्य तब दिखा जब मथुरा रेलवे पुलिस ने दर्जनभर से ज्यादा लोगों के एक समूह को रोका। ये लोग मथुरा से 225 किमी दूर मध्य प्रदेश के निवारी जिला स्थित अपने गांव के लिए पैदल ही निकल पड़े थे। इस समूह में आठ पुरुष, सात महिलाएं और करीब इतने ही बच्चे शामिल थे। मध्य प्रदेश में निवारी एक नया जिला है। पूर्व में यह टीकमगढ़ जिला की एक तहसील था।
जब इनसे बात की तो दुख व निराशा भरी एक मार्मिक कहानी सामने आई। इस समूह में से एक मजदूर 40 वर्षीय बालकृष्ण ने बताया कि वह और उनके गांव के ही कई साथी यहां मथुरा में पिछले 15 साल से किराये के मकान में रह रहे हैं। सभी लोग दिहाड़ी मजदूरी पर कई तरह के काम करते हैं। महीनेभर पहले लागू हुई देशबंदी के दौरान इन्हें काम मिलना बंद हो गया। पूरा एक महीना तो अपनी बचत के पैसों से जैसे-तैसे काट लिया। लेकिन, दोबारा पूर्णबंदी बढ़ाए जाने के बाद हौसला टूट गया। कई बार मदद मांगने की कोशिश की लेकिन मदद मिल नहीं पाई। हालात ये हो गए कि पिछले 24 घंटों से कुछ खाने तक को नहीं मिला तो पैदल ही अपने गांव लौटने का फैसला कर लिया। इस बीच, जब यह अफवाह सुनी कि मध्य प्रदेश की सरकार ने फंसे हुए प्रवासी मजदूरों के लिए सीमा पर बसें लगा दी हैं तो चार से सात साल के बच्चों व जरूरी सामान समेटकर ये सब लोग चल दिए। एक और मजदूर मूरत बताते हैं कि उन्होंने अपने साथियों सहित भोजन आदि के प्रबंध के लिए काफी प्रयास किए लेकिन कोई सफलता नहीं मिल पाई। इस बीच इतना जरूर हुआ कि इनके मकान मालिकों ने इनसे किसी प्रकार के किराये आदि की मांग नहीं की। इसके लिए बात करते समय ये मजदूर इनके शुक्रगुजार होना नहीं भूलते हैं।













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