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मोबाइल का नशा ड्रग्स से भी ज्यादा घातक, खत्म हो रही आंखों की नमी

मथुरा। कोरोना संक्रमण काल में बच्चों को आन लाइन स्टडी कराई जा रही है। इसे कोरोनाकाल में क्लास स्टडी के विकल्प के रूप मंे चुना गया है। सरकार की ओर से आनलाइन स्टडी को लेकर कुछ भी कायदे कानून तय किये गये हों लेकिन स्कूल संचालक अपने बनाये गये नियम ओर कायदों के हिसाब से ही चल रहे हैं।


इसमें बच्चों और अभिभावकों की बजाय स्कूल संचालकों का लाभ और सहूलियत ही सर्वोपरि है। स्कूल संचालक कम से कम स्टाफ के साथ काम कर रहे हैं। अभिभावक बालकिशन अग्रवाल ने बताया कि उनके दो बच्चे स्कूल में हैं। स्कूल की ओर से कोई टाइम टेबल तय नहीं किया गया है। कभी रात को दस बजे नोट डाल दिये जाते हैं। कभी दिन में दो बजे तो कभी सुबह ही क्लास शुरू हो जाती है। कई बार देख नहीं पाने पर बच्चे होमवर्क पूरा नहीं कर पाते हैं। स्थिति यह हो गई है कि बच्चे हर समय मोबाइल पर ही लगे रहते हैं। वह चिडचिडे हो रहे हैं, सामान्य बातों को भी भूलने लगे हैं। राधिक विहार निवासी यश शर्मा का कहना है कि बच्चे मोबाइल आदी हो रहे हैं। सुबह जगते ही बच्चों का हाथ सबसे पहले मोबाइल पर जाता है। दिन की शुरूआत मोबाइल से होती है। इसी तरह के अनुभव दूसरे अभिभावकों के भी है। बावजूद इसके इस बात को लेकर किसी स्तर पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है जिसस यह तय हो सके कि कितने समय तक बच्चे मोबाइल पर काम कर सकें। अधिक समय तक मोबाइल पर रहना बच्चों के मानसिक और शारीरिक रूप से घातक है। इस पर बहुत पहले काम शुरू हो गया था।


अगस्त 2019 में जिला अस्पताल में खोले गए मानसिक बीमार लोगों के इलाज वाले कक्ष में बच्चों को मोबाइल के नशे से मुक्त कराये का इलाज भी शुरू हुआ था। तत्कालीन महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य की ओर से की गई पहल के बाद स्थानीय मेहकमा भी हरकत में आये थे। महानिदेषक की ओर से सीएमओ को पत्र लिखा गया था जिसमें कहा गया था कि आत्महत्या की बढती घटनाओं, मोबाइल नशा जैसे नवीन मनोविकारों की रोकथाम के लिए बच्चों को परामर्श एवं औषधियां उपलब्ध कराई जायें।


तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी डाक्टर शेर सिंह ने इसके बाद जिला अस्पताल में इसकी व्यवस्था कराई थी। सीएमएस डा.शेर सिंह का कहना था कि मोबाइल का अधिक प्रयोग करते-करते आज कल युवा, वयस्क सहित प्रत्येक आयु वर्ग में एक नवीन रोग ने जन्म लिया है। मोबाइल का प्रयोग लोगों द्वारा इस हद तक किया जा रहा है कि उनकी आंखें भी शुष्क हो जा रही हैं। यदि बच्चों से मोबाइल ले लिया जाये या उन्हें मोबाइल प्रयोग करने से मना किया जाये तो वे आक्रामक हो रहे हैं।

ये पडता है बच्चों पर असर


मोबाइल का नशा शराब और ड्रग्स वाले नशे से भी बढ़कर है। इसकी वजह से बच्चों में नींद न आना, भूख की कमी, दिमाग पर बुरा असर और आख खराब होने जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। किसी व्यक्ति में इस लत के आने से पहले तक मोबाइल के किरदार को देखें तो ये एक ऐसा माध्यम था जिसने जीवन को बिल्कुल ही सरल बना दिया था। किसी से बात करनी हो या कोई सन्देश भेजना है तो यह काम झट से हो जाता है। ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक गेम जो कभी-कभी अवसाद में ले जाकर आत्महत्या के कगार पर छोड़ जाते है।

जिला चिकत्सालय में काम कर रहा सैंटर


महर्षि दयानंद सरस्वती जिला अस्पताल में बाकायदा एक सैंटर खोला गया था। जहां मोबाइल एडिक्ट बच्चों और बडों को मोबाइल की लत छुडाने के लिए चिकित्सकीय परामर्श दिया जा रहा है। अभिभावक बच्चों में बढती इस लत से आजिज हैं लेकिन वह खुद भी इसका मोह नहीं छोड पा रहे हैं।

 

नारद संवाद

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