देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read More29 जून 2025 को गुप्त नवरात्रि का चौथा दिन, यानी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, महाविद्याओं की श्रृंखला में चौथे स्थान पर प्रतिष्ठित देवी भुवनेश्वरी की उपासना के लिए समर्पित होता है। माँ भुवनेश्वरी को "भुवन" अर्थात ब्रह्मांड की अधीश्वरी कहा गया है। वे सृजन की शक्ति, ब्रह्मांडीय सत्ता और वाणी की अधिष्ठात्री हैं। गुप्त नवरात्रि की साधना में यह दिन न केवल गहन तांत्रिक अनुभवों का, बल्कि आंतरिक व्यवस्था और मनोबल को पुनर्गठित करने का भी अवसर होता है।
माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप और दार्शनिक प्रतीक
माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य, शांत और दिव्य है। उन्हें लाल या सुनहरी आभा में कमल पर आसीन बताया गया है। उनके चार हाथों में अंकुश, पाश और वर-मुद्राएं होती हैं। यह प्रतीक हैं—वाणी पर नियंत्रण, आंतरिक शक्ति, और अनुग्रह की। देवी भुवनेश्वरी को "त्रैलोक्यमोहिनी" भी कहा गया है, क्योंकि उनका तेज त्रिलोक (भू, भुवः, स्वः) को मोहित कर देता है।
शास्त्रों में भुवनेश्वरी को सृष्टि की मूल शक्ति माना गया है, जिनकी इच्छा से संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती है। उनकी उपासना साधक को 'अहम ब्रह्मास्मि' के बोध की ओर अग्रसर करती है। वे सत्ता की, लेकिन सहिष्णु सत्ता की प्रतीक हैं—एक ऐसी शक्ति जो आदेश से नहीं, प्रेम और करुणा से संचालित होती है।
चतुर्थी तिथि और साधना का योग
हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि गणपति से जुड़ी मानी जाती है, जो बुद्धि और वाणी के देवता हैं। इसी दिन देवी भुवनेश्वरी की उपासना गुप्त नवरात्रि में करना विशेष फलदायी माना गया है। साधक इस दिन मौन व्रत, ध्यान, और प्राणायाम के माध्यम से अपनी वाणी, विचार और मानसिक स्थिति को शुद्ध करता है।
भुवनेश्वरी की साधना वाणी की मर्यादा, प्रभावशाली अभिव्यक्ति और मानसिक आकाश की विस्तार का प्रतीक है। वे चेतना के उस स्तर से जोड़ती हैं, जहाँ शब्द केवल ध्वनि नहीं, बल्कि ब्रह्म की कंपन बन जाते हैं।
तांत्रिक साधना में भुवनेश्वरी का स्थान
तंत्रशास्त्र में भुवनेश्वरी को सृष्टि की आदिशक्ति कहा गया है। उनकी साधना एक ओर जहाँ साधक को ‘सत्ता’ के प्रति आत्मज्ञानी बनाती है, वहीं दूसरी ओर सांसारिक संबंधों में संतुलन और गरिमा स्थापित करने की क्षमता भी प्रदान करती है।
गुप्त नवरात्रि की साधना में भुवनेश्वरी का दिन वह पड़ाव है, जहाँ साधक अब तक की उग्र और रहस्यमयी शक्तियों के बाद सृजन, शांति और विस्तार की ओर बढ़ता है। यह दिन विशेष रूप से उन साधकों के लिए उपयोगी होता है जो समाज, शासन या शिक्षा से जुड़े कार्यों में नेतृत्व की भावना को जागृत करना चाहते हैं।
ज्योतिषीय संयोग
29 जून को शुक्र ग्रह वृषभ राशि में गोचर करेंगे, जो भुवनेश्वरी की ऊर्जा से सीधा संबंध रखता है। शुक्र सौंदर्य, प्रेम और कलात्मकता का प्रतिनिधि ग्रह है, और उसकी यह स्थिति साधना में सौम्यता और प्रभावशीलता लाने वाली है। इस दिन की ग्रह स्थिति साधकों के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जा रही है—विशेषतः जिनका लक्ष्य मानसिक संतुलन, सार्वजनिक प्रभाव और आंतरिक जागरूकता है।
आधुनिक जीवन में भुवनेश्वरी की साधना का प्रभाव
माँ भुवनेश्वरी की उपासना आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। जहाँ एक ओर जीवन में संवाद, अभिव्यक्ति और प्रभावशाली वाणी की भूमिका बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति को आंतरिक स्थिरता और सृजनात्मकता की भी आवश्यकता होती है। देवी भुवनेश्वरी की साधना से मनुष्य यह सीखता है कि सत्ता केवल बाहरी नियंत्रण नहीं, बल्कि भीतर की करुणा, विचारशीलता और संतुलन से प्राप्त होती है।
गुप्त नवरात्रि का चौथा दिन देवी भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त करने का दिन है—एक ऐसी शक्ति जो सृजन करती है, लेकिन उसी सृजन को संरक्षित भी करती है। उनकी साधना साधक को आत्म-विस्तार, प्रभावशाली विचार और जीवन की व्यापकता का बोध कराती है। गुप्त नवरात्रि की यह साधना जीवन को केवल तीव्र नहीं, बल्कि सुंदर, सुव्यवस्थित और गूढ़ बनाती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और आध्यात्मिक परंपराओं पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी समाज में प्रचलित सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विश्वासों के अनुसार प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य किसी प्रकार की अंधश्रद्धा को बढ़ावा देना नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी साधना या तांत्रिक अभ्यास से पूर्व योग्य और जानकार गुरु अथवा आचार्य से परामर्श अवश्य लें।
साभार-khaskhabar.com













Related Items
भाई दूज 2025: पवित्र स्नेह का उत्सव, जानिए तिलक का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि
कृष्ण जन्माष्टमी 2025: 15 या 16 अगस्त? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण का समय और विशेष महत्व
रक्षाबंधन 2025: 297 वर्षों बाद बन रहा दुर्लभ ग्रह संयोग, भद्रा रहित दिन में राखी बांधना होगा बेहद शुभ