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MATHURA : सरकार को झेलना पडा श्रमिक संगठनों का विरोध

मथुरा। भारतीय संविधान लागू होने से पहले श्रमिक संगठनांे द्वारा संघर्ष और बलिदान से लिये गये अधिकारों को उत्तर प्रदेश सरकार की एक अधिसूचना ने झटके में छीन लिया था। इसके बाद श्रम संगठन हक्का बक्का रह गये। देश भर में लाॅकडाउन लागू होने के चलते संगठनों ने संकेतिक आंदोलन के साथ ही सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का हर रास्ता अपनाया। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ से जुडे श्रम संगठन ने भी सरकार के इस फैसले की खुलकर आलोचना की और इसे वापस लिये जाने का दबाव बनाया।
खिल भारतीय मजूदर संघ की केंद्रीय समिति के सदस्य जेपी सिसौदिया ने बताया कि मजदूर इस समय लाॅकडाउन के कारण वैसे ही बेघर हैं और ऊपर से सरकार श्रम कानून में तीन वर्ष के लिए संशोधन करके मजदूरों के हितों पर कुठाराघात करने जा रही थी। कडे विरोध के बाद सरकार ने फैसाल वापस ले लिया है। सरकार का फैसला स्वागत योग्य है।
अखिल भारतीय मजदूर संघ के मथुरा जिला मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा ने बताया मजदूर इस समय वैसे ही बेरोजगार हो गया है और सरकार ऐसे समय में क्यों कानून लाई यह समझ से परे था, सरकार ने अब सही फैसला लिया है।
श्रम विकास संगठन के जिलाध्यक्ष दिलप सिंह ने बताया कि राज्य सरकार ने आठ मई को अधिसूचना जारी करके मजदूरों के काम के घंटों में बदलाव किया था। उनकी कार्य अवधि को बढ़ाकर 12 घंटे तक कर दिया गया था। वर्कर्स फ्रंट ने इस अधिसूचना के विरोध में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी, जिस पर अदालत ने सरकार को नोटिस जारी किया था। 
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई की तिथि 18 मई निर्धारित की है। नोटिस जारी होने के बाद प्रमुख सचिव श्रम ने शुक्रवार को मुख्य स्थायी अधिवक्ता को पत्र भेजकर श्रमिकों की कार्य अवधि 12 घंटे करने के संबंध में आठ मई की अधिसूचना को निरस्त करने की जानकारी दी। 
यह अधिसूचना 15 मई को निरस्त की गई है।

श्रमिक विकास संगठन ने रखा एक दिवसीय उपवास
श्रमिक विकास संगठन के आह्वान पर लाॅकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अपने अपने आवास पर एक दिवसीय उपवास रख कर प्रदेश की भाजपा सरकार से श्रमिक विरोधी अध्यादेश वापस लेने की मांग की गई। यूपी की सरकार ने इस अध्यादेश को तीन साल के लिए लागू किये जाने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा था।

बंधुआ मजदूरी वाले युग में पहुच जाते श्रमिकः रवि भारद्वाज
श्रमिक विकास संगठन प्रदेश सचिव रवि भारद्वाज कहाकि इसकी मंजूरी के साथ ही श्रमिकों से उनके हक के 35 अधिकार छिन जाते। इसके बाद मजदूर दास प्रथा की तरह मालिकों के गुलाम बन जाते। ऐसे कानूनी अधिकार भी सरकार छीन रही थी जिन्हें श्रमिकों ने कडे संघर्ष के बाद क्रूर अंग्रेजी हुकूमत से हासिल किये थे। इन अधिकारों को हासिल करने के लिए मजदूरों की जान भी गईं थीं और यातनाएं भी सहनी पडी थीं। कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम 1923, ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, कार्य स्थल सुरक्षा अधिनियम 1948, संविधान लागू होने से पहले से प्राप्त अधिकार हैं। काम के 8 घंटों को बढा कर 12 घंटे करना 1 मई 1886 के संघर्ष को अपमानित करना है। जिससे पूरी दुनियां के मजदूरों ने प्रेरणा ली।


 

नारद संवाद

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