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गंगाजल : सच में जीवन-जल है

गंगा रिवर बेसिन की सभ्यता को जलीय सभ्यता कहा जा सकता है। गंगा-जल, सच में जीवन-जल है। इसलिए, ‘गंगा रिवर बेसिन’ में जल-संरक्षण करना और बाढ़ व कटान को कम करना, दोनों ही जरूरी हैं। इन दोनों उद्देश्यों के साथ गंगा की स्वच्छता और पर्यावरण के संरक्षण का लक्ष्य भी जुड़ा हुआ है। गंगा और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सन 2015 में ‘नमामि गंगे’ नामक एकीकृत ‘गंगा संरक्षण मिशन’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मुझे संतोष है कि सरकार द्वारा शुरू किए गए इस मिशन के अच्छे परिणाम दिखाई देने लगे हैं। मुझे बताया गया है कि बनारस के घाट अब साफ सुथरे है। गंगा नदी व घाटों तथा बनारस शहर में स्वच्छता पर ज़ोर देने के कारण न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिला है बल्कि पर्यटकों के लिए  बनारस की यात्रा और अधिक आनंददायक हो गई है।

महात्मा गांधी को सन 1916 की बनारस यात्रा के दौरान विश्वनाथ मंदिर की संकरी और गंदी गलियों को देखकर बहुत कष्ट हुआ था

महात्मा गांधी को सन 1916 की बनारस की अपनी यात्रा के दौरान विश्वनाथ मंदिर की संकरी और गंदी गलियों को देखकर बहुत कष्ट हुआ था। वे इस बात से भी क्षुब्ध थे कि गंगा के किनारे बसे शहरों की सारी गंदगी गंगा में प्रवाहित की जाती थी। काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के नए स्वरूप एवं आसपास के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। विश्वनाथ मंदिर की संकरी गलियों और गंदगी को देखकर गांधीजी व्यथित हो गए थे। अब परिस्थिति बदल रही है। निकट भविष्य में ही मंदिर का एक भव्य स्वरूप देशवासियों के सामने होगा। काशी का यह बदलता स्वरूप अपनी पुरातनता को भी संजोये हुए है। परंतु, पुरातनता का मतलब जड़ता नहीं है। किसी भी देश व समाज की जड़ता उसके क्षय और पतन का कारण बनती है। इसीलिए बनारस के लोगों से मेरा आग्रह है कि पुरातनता और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करें।

गंगा को स्वच्छ रखना सभी देशवासियों का सामाजिक और व्यक्तिगत दायित्व 

गंगा को स्वच्छ रखना, पर्यावरण का संरक्षण करना और हमारी संस्कृति और धरोहर को समृद्ध बनाना केवल सरकारों का काम नहीं है बल्कि सभी देशवासियों का सामाजिक और व्यक्तिगत दायित्व भी है। इस सोच को देशव्यापी स्तर पर अपनाने और आत्मसात करने की जरूरत है। बनारस में अध्यात्म, साहित्य और संगीत का अद्भुत संगम रहा है। आज से लगभग छब्बीस सौ वर्ष पहले इसी क्षेत्र में स्थित सारनाथ में गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम संदेश दिया था। आदि शंकराचार्य को काशी में ही यह ज्ञान प्राप्त हुआ था कि सभी प्राणियों में एक ही ब्रह्म व्याप्त है।

काशी, देश के सर्वाधिक भारत-रत्नों की जन्मस्थली व कर्मभूमि रही

काशी, देश के सर्वाधिक भारत-रत्नों की जन्मस्थली व कर्मभूमि रही है। लाल बहादुर शास्त्री, डॉक्टर भगवान दास, उस्ताद बिस्मिल्ला खां और पंडित रविशंकर बनारस में पैदा हुए और यहीं उन्होंने अपनी प्रतिभा को तराशा। इनके अलावा, महामना मदन मोहन मालवीय ने बनारस को ही अपनी मुख्य कर्मस्थली बनाया। हमारे देश के एक बहुत बड़े भाग में पर्यावरण और संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन तभी हो सकता है जब गंगा की धारा अविरल व निर्मल बनी रहे। 

संत कबीर ने कहा था...

"कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर 
यानि गंगा जल को ही निर्मलता की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता था।"

आज हम सबका दायित्व गंगा को फिर से निर्मल बनाना

आज हम सबका दायित्व बन जाता है कि गंगा को एक बार फिर हम निर्मलता के उसी स्तर पर ले जाएं जिसका विवरण हम संत कबीर, संत रविदास तथा प्राचीन काल के ऋषि मुनियों की वाणी में पाते है। उसी स्तर की स्वच्छता को  प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर 'नमामि गंगे' तथा अन्य अभियान चलाए जा रहे है। सन 1920 के बाद भारतीय पत्रकारिता पर गांधीजी का गहरा प्रभाव पड़ा था। गांधीजी स्वयं भी पत्रकार थे। गांधीजी के समकालीन पत्रकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर और मुंशी प्रेमचंद जैसे संपादक थे। काशी में सक्रिय रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसी विभूतियों ने भारत की पत्रकारिता को नए आयाम दिए। उन्होंने राष्ट्रपति, संसद और संविधान जैसे नए शब्दों से हिंदी को समृद्ध किया।

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