देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreकाशी विश्वविद्यालय से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद आजीवन कथा वाचन और अध्यापन कार्य में रत रहे देवीराम शास्त्री को आज भी क्षेत्रीय लोग याद करते हैं। यूं तो उन्होंने आज से 34 साल पहले अपने नश्वर शरीर को छोड़ दिया था लेकिन आज भी उनके सानिध्य में रहे आगरा, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस व फीरोजाबाद जिला क्षेत्रों एवं अन्य नजदीकी गांवों के उनके हजारों शिष्य उनकी सादगी, विद्वता, सहजता एवं संवेदनशीलता को बखान करते हुए नहीं थकते हैं। देवीराम शास्त्री की शुरुआती शिक्षा मोती राम संस्कृत पाठशाला गोकुल में हुई थी।
इसके बाद काशी विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने बिसावर के एसबीजे इण्टर कॉलेज में संस्कृत प्रवक्ता के पद पर रहकर अपनी सेवाएं प्रदान की। उन दिनों वृन्दावन में संपूर्ण भारत के संस्कृत विद्वानों की एक गोष्ठी हुआ करती थी। उस गोष्ठी में वृन्दावन निवासी उनके कॉलेज के सहयोगी और संस्कृत विद्वान स्व. केशव देव शास्त्री और देवीराम शास्त्री दोनों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था।
बल्देव स्थित श्री हलधर समग्र दर्शन शोध संस्थान के निदेशक व मुख्य मंदिर के सेवायत डॉ. घनश्याम पाण्डेय बताते हैं कि वह बेहद विनम्र और सौम्य स्वभाव के व्यक्तित्व थे। जब वह ब्रज भाषा और कड़ी बोली में भागवत कथा वाचन करते थे तो लोगों को कथा सुनने के बाद एक अलग तरह की आत्मीय तृप्ति को बोध होता था। पांडेय बताते हैं कि उन्होंने अपने हजारों शिष्यों से धूम्रपान की आदत को छुड़वाया था। आज भी उनके शिष्य इस बात की मिसाल देते हैं। उनके ही एक शिष्य केशव देव गौतम बताते हैं कि शास्त्री जी द्वारा हर शनिवार को प्रार्थना के बाद संस्कृत में गीता में बताए हुए मार्ग पर चलने संबंधित प्रवचन देते थे।
आज भी उनके हजारों शिष्य उनके द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करते हैं। बिसावर निवासी डाल चंद्र वर्मा अपने अनुभव के बारे में बताते हुए कहते हैं कि बचपन में उन्हें पढ़ने-लिखने में कोई रुचि नहीं थी लेकिन एक बार शास्त्रीजी के सानिध्य में जाने के बाद उनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह आगरा विश्वविद्यालय से न केवल प्रथम श्रेणी में स्नातक डिग्री हासिल करने में कामयाब रहे बल्कि बाद में एक नामी बैंक में सक्षम अधिकारी की तरह काम करते रहे। वृन्दावन निवासी श्रीविजय गोस्वामी जी बताते हैं कि उनका बेहद सादगी से किए जाने वाला कथा वाचन संस्कृत और हिंदी दोनों भाषाओं में धाराप्रवाह होता था। उनके मुख से कथा सुनते वक़्त मन और चित्त दोनों तृप्त हो जाते थे। उनके ही एक अन्य शिष्य विजयभान शर्मा बताते हैं कि उन्हें हमेशा शास्त्री जी से नई बातें ही सिखने को मिलती रहीं।
विजयभान का कहना है कि वह अपने समय में संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। बचपन में शिक्षा प्राप्ति के लिए जद्दोजहद करने वाले जगदीश चौधरी बताते हैं कि उन दिनों में उनके लिए शिक्षा प्राप्ति जब महज एक सपना थी और भोजन करने तक के पैसे भी नहीं हुआ करते थे तब उनकी शिक्षा में रुचि को देखते हुए शास्त्री जी ने उनके लिए शिक्षा ग्रहण करने का मौका उपलब्ध कराया था। शास्त्री जी के बारे में बात करते हुए आज भी उनकी आंखें नम हो जाती हैं। फिलहाल जगदीश गुजरात राज्य से ग्राम विकास अधिकारी पद पर कार्य करने के बाद सेवानिवृत जीवन बिता रहे हैं।
हाथरस जनपद से लगे हुए सहपऊ कस्बे के मोती यादव बताते हैं कि उस वक़्त आस-पास के गांवों में रहने वाले लोग हजारों की संख्या में भागवत कथा सुनने आते थे। यह वह दौर था जब भागवत कथा के कुछ ही विद्धान हुआ करते थे। उनके ही एक शिष्य शिवप्रकाश गौतम का कहना है कि उनके श्रीमुख से जो दिव्य आनन्दधारा प्रवाह होती थी वैसी आज के कथावचाकों में देखने को नहीं मिलती है। आज के अधिकांश भागवताचार्यों का ज्यादातर समय तो गैरजरूरी गीत-संगीत में ही निकल जाता है।
ब्रज के ग्राम सेदरिया में तत्कालीन सीओ स्व. द्वारका प्रसाद गौतम द्वारा आयोजित उनकी अंतिम भागवत कथा वाचन आयोजन और एक विशाल यज्ञ को लोग आज भी याद करते हैं। अपने खराब स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें लग रहा था कि आयोजन सफल नहीं हो सकेगा। लेकिन, स्वामी अखंडानंद जी महाराज के शिष्य संत सूरदास के विशेष आग्रह से आयोजन शुरू किया गया। शास्त्री जी ने भागवत कथा के प्रथम दिन आश्रम के पूरे 30 साल का सफरनामा बताया और आयोजन के तीसरे दिन व्यास गद्दी पर ही गोकुलवासी हो गए। आज भी वहां के भक्तों और उनके शिष्यों द्वारा इस अनोखी घटना का विवरण बताया जाता है।













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