देवरिया का ऐसा मंदिर जिसे श्रद्धालु बताते हैं 'अश्वत्थामा' की तपोभूमि
Read Moreमथुरा। इस बार सिर्फ भादों में ही मेघा बरसे, सावन सूना निकल गया और क्वार मास भी सूखा जा रहा है। भादौं में हुई ठीकठाक बरसात से ललचाये किसानों ने खेतों में वहां भी फसल रोप दी जहां वह रोपना नहीं चाह रहे थे। अब यह लालच ही उनके गले की फंस बन गया है। पूरे क्वार के महीने में सिर्फ एक बरसात हुई है। इस बार लाख दावों के बावजूद सिंचाई विभाग अधिकांश रजवाहों में पानी नहीं पहुंचा सका है।
किसन खरीफ की फसल को लेकर असमंजस में है। अभी तक खेतों में खडी फसल को देख कर खुश हो रहे किसान के चहरे पर झुर्रियां पड रही हैं। फसल को बचाने के लिए पानी की दरकार है। मजबूरी में कई जगह किसान तिल, बाजारा की पिछेती फसलों को बीच में ही नष्ट करने को जबूर हो रहे हैं। वह चाहते हैं कि यह फसल नहीं हो रही तो खेत को रवी की फसल के लिए तैयार कर लिया जाए।
मानसून के बादल जुलाई से सितंबर के बीच रूठे रहे। मथुरा में 66 फीसदी बारिश कम दर्ज की गई। कम बारिश होने का असर भूगर्भ जलस्तर और ट्यूबवेल से सिंचाई करने वाले किसानों पर पड़ेगा। उन्हें खेतों में नमी बनाए रखने के लिए डीजल पंप या ट्यूबवेल चलाना होगा, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है। मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के मुताबिक केवल प्रदेश में सबसे कम बारिश हुई बरसात वाले जनपदों में मथुरा सामिल है।
लागत अधिक, कीमत मिल रही कम
पानी की कमी से सूख रहीं फसलों को बचाने के लिए किसान को महंगे डीजल से खेतों की सिंचाई करनी होगी। जबकि खरीफ की फसलों की समर्थन मूल्य पर लेनदार नहीं है। बाजारा मथुरा मंडी में 900 रूपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। धान, मक्का की कीमत भी ठीक नहीं मिल रही है। ऐसे में खरीफ की फसल को बचाना और फिर उससे मुनाफा निकालना मुश्किल हो गया है।













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